नूरजहाँ की बारादरी के ठीक उत्तर में स्थित है विक्टोरिया हॉस्पिटल। विक्टोरिया हॉस्पिटल-शहर का सबसे बड़ा खैराती हॉस्पिटल। हयात शहर के गरीब और बेसहारा लोगों के लिए शमशान जाने से पहले एक आखिरी उम्मीद। वैसे बाकी खैराती अस्पतालों से इतर यहाँ के डॉक्टर लोग काफी अच्छे है।
आज सुबह से ही वार्ड नं. 33 में काफी गहमागहमी है। वार्ड नं. 33 -कैंसर वार्ड। सीनियर रेजिडेंट सुबह का राऊंड लेकर वापस ओ. पी. डी. में लौट चुके है। जूनियर डॉक्टर ड्यूटी रूम में मरीजो का आज का ट्रीटमेन्ट प्लान लिख रहे है। कैंसर मतलब कर्करोग, सुनने में तो लाइलाज रोग है, पर ऐसा नहीं है। मरीज अगर शुरूआती स्टेज में पूरा इलाज ले तो कैंसर का पूर्ण उपचार संभव है। पर जैसा कि पूरे भारत में होता है, मरीज सबसे पहले झाड़-फूँक वाले ओझा के पास जाता है, वहाँ आराम न मिला तो मौहल्ले के झोला छाप के पास। अगर वहाँ भी इलाज नहीं हुआ तो आयुर्वेद, होम्योपैथ से होते हुए सबसे आखिर में पहुँचते है हमारे यहाँ तब तक हमारे पास कुछ ज्यादा ऑप्सन नहीं बचते। वजह- तब तक कैंसर पूरे शरीर में फैल चुका होता है। फिर भी हम लोग दिन-रात लगे रहते हैं।
मैं ट्रीटमेन्ट फाइल सिस्टर को सौंपता हूँ।
“दस नम्बर के कीमो लगनी है, सात को Ondensetron ऐड किया है TDS. दो नम्बर के Enema. बाकी सब CST… CST मतलब Continue same treatment. मैं वापस ड्यूटी रूम में आ गया। थोड़ी देर बाद सिस्टर ड्यूटी रूम में आती है।
“सर! ग्यारह नम्बर Back Pain की कम्पलेन कर रहा है।” सिस्टर बोलती है।
“उसके तो मोर्फीन चल रही है ना”
“हाँ सर! सर वो वी. आई. पी. पेशंट है। किसी I.A.S. का रिश्तेदार है, आप एक बार देख लेते तो ठीक रहता|”
“ठीक है! मैं देखता हूँ।”
मैंने 11 नम्बर मरीज को देखा और ट्रीटमेन्ट रिवाइज करके वापस ड्यूटी रूम में लौट आया। थोड़ी देर बाद 11 नम्बर बेड के पास सिटिंग बेंच पर बैठी लड़की ड्यूटी रूम में आयी।
“मरीज क्या लगता है तुम्हारा”
“वो मेरे बाबा हैं। I mean- पापा।” वो बोलती है।
“तुम्हे पता है उन्हें कौन-सा कैंसर है?”
“जी पता है- मल्टीपल मायलोया।”
“देखों! उन्हें मल्टीपल मायलोया है- एक तरह का ब्लड कैंसर, जिसका पूरा इलाज संभव नहीं है, सिर्फ रोकथाम की जा सकी है।”
“लेकिन दर्द का तो कोई इलाज होगा।”
“हमारे शरीर में ब्लड सेल्स हड्डियों की Marrow में बनती हैं। पर इनके Marrow में नार्मल सेल्स न बनकर कैंसर सेल बन रही है और यही इनके दर्द की वजह है। हम दर्द के लिए अभी मोर्फीन दे रहे है, बाकी कीमो लगने पर दर्द में आराम आ जायेगा।” मेरे जवाब से संतुष्ट होकर वह जाने लगती है।
“रूको!” मैं आवाज देता हूँ।
“जी”
“तुम्हारे परिवार में I.A.S. कौन है?”
“जी, कोई नहीं”
“फिर सिस्टर…………..।”
“जी उन्हें मैंने ही बोला था। मुझे लगा था I.A.S. बोलने पर हमे Priority मिलेगी” कहकर वो गर्दन झुका लेती है।
“तुम्हें स्टाफ से या हमारे इलाज से कोई शिकायत है?”
“जी नहीं।”
“देखो! हमारे लिये सब मरीज बराबर है। हम अपनी ओर से इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ने। यहाँ और भी मरीज भर्ती है। यह बात तुम्हें समझनी पड़ेगी।” वो चली जाती है। थोड़ी देर बाद सिस्टर ने बताया कि वो उन्हें सॉरी बोलकर गयी है। मैं अपने काम में लग जाता हूँ। अगले दिन कीमो लगने के बाद वो मरीज डिस्चार्ज हो जाता है।
ऐसा कम ही होता है कि किसी मरीज या उसके किसी रिश्तेदार का चेहरा हमारी नजरों में अटक जाये। उस दिन सिस्टर ने बताया था कि सर! इस लड़की के साथ किसी को नहीं देखा। ना घरवालों कोए ना ही किसी रिश्तेदार को। ऐसा अनमूमन सरकारी अस्पतालों में कम ही देखने को मिलता है। यहाँ हरदम एक मरीज के साथ दहाई में रिश्तेदार उपलब्ध रहते हैं, जिनमें से अधिकतर को मरीज या उसके मर्ज से कोई मतलब नहीं रहता। इनका सिर्फ एक ही काम होता है- वहाँ बैठकर मौहल्ले भर की पंचायत करना। और मरीज को दो-पाँच दिन भर्ती रहना पड़े तो ये मोहल्ले के एक-दो कुँवारों का रिश्ता जरूर पक्का करवा देते हैं। कुछ तो मरीज की खस्ता हालत का फायदा उठाकर उसकी लड़कियों का रिश्ता किसी ऐरे-गैरे से कराने से भी नहीं चूकते। पर इस केस में ऐसा नहीं था और यही बात मुझे खटक रही थी|
तीन दिन बाद, रात दस बजे मैं हैड ऑफ डिपार्टमेन्ट को Evening over देने की तैयारी कर रहा था। तभी तभी उस लड़की ने ड्यूटी रूम में एन्टर किया| उसके हाथ में एडमिशन फाइल थी।
“सर! New Admission”
“आ गई तुम”
“आपने ही तो D4 कीमो की डेट दी थी”
“ठीक है। ये जाँचो के संपल भिजवाओं और ये दवा लानी है” मैंने जाँचों की पर्ची और प्रेस्क्रिप्सन लिखकर उसे पकड़ा दिया।
“और सुनो! मरीज को मेल वार्ड में सात नम्बर बेड पर लिटाओं।” मैं अपने काम में लग गया । वो मरीज को सात नम्बर बेड पर लिटाकर दवा लेने चली गयी| वो पन्द्रह मिनट बाद वापस लौटी। मैं घर जाने की तैयारी कर रहा था।
“सर रूको! खैराती धर्मशाला तक मैं भी आपके साथ चलती हूँ।“
मैं दो सैकण्ड के लिए रूका। वो मेरे साथ चलने लगी।
“नाम क्या है तुम्हारा?”
“सनोबर”
“मोमडन हो?”
“नहीं”
“नाम तो मोमडन है|”
“घर वालों ने यही नाम रखा है|”
“Okay पढ़ाई?”
“Human Psychology में एम.ए. कर रही हूँ”
“Good! घर में कौन-कौन हैं?”
“सब है। भैया-भाभी, माँ, ताई-माँ, दीदी”
“वार्ड में तो किसी को नहीं देखा मैंने!”
”माँ और दीदी के अलावा किसी को मतलब नहीं है उनसे” बोलकर उसने गर्दन झुका ली।
“वैसे मतलब तो हमें भी नहीं है पर….”
“मतलब?” मैंने पूँछा
“मैं उन्हें पसन्द नहीं करती”
“अजीब लड़की हो। अपने बाबा को हाथों में लिये-लिये घूम रही हो और कह रही हो…………..मतलब नहीं है।
Are yo Mad?
“Yes, I am”
हम खैराती धर्मशाला पहुँच चुके थे। Just wait कहकर वो अन्दर चली गयी। थोड़ी देर बाद धर्मशाला में रूम लेने का फार्म लेकर वापस लौटी।
“फार्म पर साइन कर दीजिए। डॉक्टर के साइन बिना रूम नहीं मिलेगा।
“तुम अगर यहाँ रूकोगी तो मरीज के पास कौन रूकेगा”
“आपको लगता है आपके हॉस्पिटल के लेट-बाथ में कोई नहा-धो सकता है?”
“तुम्हें इसकी शिकायत हैड ऑफ डिपार्टमेन्ट या अस्पताल प्रशासन को करनी चाहिए।” उसने फार्म मेरे हाथ में दे दिया। मैने साइन कर दिये। वो वार्ड में वापस लौट गयी। मैं घर आ गया।
पहली मुलाकात में ही वो मुझे मिस्टीरियस सी लगी। खाना खाकर मैं बिस्तर पर लेट गया पर आँखों से नींद नदारद थी। उसके नाम से लेकर उसका परिवार और उसकी बातों ने मेरे दिलो-दिमाग में खलबली मचा रखी थी।
“एक लड़की जो अपने पिता से नफरत करती है, वो भला उसका इलाज क्यों करायेगी”
“आप और आपके ये मरीज रात को चैन से सोने भी नहीं देंगे” मेरी वाइफ ने रोज की तरह मेरे ऊपर अपनी थोड़ी भड़ास निकली और करवट बदलकर सो गई। शायद मैं नींद में बड़बड़ा रहा था। अगली सुबह मैं वार्ड में पहुँचा। लड़की वहाँ नहीं थी। मैंने वार्ड का राऊँड लिया और ओ. पी. डी. में चला गया। दो बजे तक मैं ओ. पी. डी. में ही रहा। उस दिन मेरी Evening Duty थी, सो मैं हॉस्टल में खाना खाकर वापस वार्ड में आ गया। सनोबर वहीं थी। वो ड्यूटी रूम में आ गई।
“मुड्डा क्लब चलोगे?”
“5 मिनट” मैंने हाथ से इशारा किया। मैने फाइलों का काम निपटाया और सिस्टर से कैंटीन जाने की बोलकर उसके साथ मुड्डा क्लब आ गया। मुड्डा क्लब कोई ट्रेडीशनल क्लब नही था। मुड्डा क्लब एक मॉर्डन चाय की थड़ी थी। रैगिंग के दौर में किसी जूनियर की यहाँ आप-पास फटकने तक की हिम्मत नहीं होती थी पर रैगिंग बैन होने के बाद सब बदल गया। अब वहाँ कोई भी आ सकता था पर अब भी ज्यादातर कस्टमर मेडिकल स्टूडेन्ट या डॉक्टर ही होते थे। उसने अपनी जीन्स की पोकेट से सिगरेट निकालकर जलायी और गहरा कष लेकर धुँआ ऊपर आसमान की ओर छोड़ दिया।
“तुम सिगरेट भी पीती है?”
“हाँ! क्या लड़कियाँ सिगरेट नहीं पी सकती?”
“पी सकती है, पर क्या तुम्हें पता है तुम्हारे बाबा के कैंसर का एक कारण स्मोकिंग भी रहा है”
“नहीं, उसे समोकिंग से कैंसर नहीं हुआ। उन्हें मेरी बद्दुआ लगी है।”
“तुम्हारी बातों से सर दुखता है मेरा। हमेशा बेसिर-पैर की बातें करती हो”
“वो तो है। पता है मुन्ना भाई ने एक बात कही थी अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम्हे दूसरा गाल भी आगे कर देना चाहिए। पर मेरा मानना है कि अपना पूरा जिस्म उसके आगे कर दो। हो सकता है वो तुम्हें मार ही डाले, पर आखिर में जब वो थक जाऐगा, तब वो खुद-ब-खुद मर जायेगा।”
“पहली बात तो ये कि ये बात महात्मा गाँधी ने कही थी, मुन्नाभाई ने नहीं। दूसरा-तुम्हारी बातें मेरे सर के ऊपर से जा रही हैं।”
उसकी सिगरेट खत्म हो चुकी थी।
“वार्ड में सब ठीक हो तो थोड़ा आगे तक चले?’’ उसने पूँछा।
“एक मिनट!’’ मैने सिस्टर को फोन कर वार्ड का जायजा लिया। वार्ड में सब ठीक था।
“ठीक है। अब चलते है|” मैनें दो चिप्स के पैकेट लिये और हम बारादरी की ओर चल पड़े।
“तुम्हें मेरे नाम का मतलब पता है?”
“हम्म……….कुछ कुछ…………. Pine Tree को उर्दू में सनोबर करते है”
“बिल्कुल सही। कभी शिमला गये होंगे तो देखा होगा, बर्फ से ढके पहाड़ों पर सनोबर के जंगल बहुत खूबसूरत लगते हैं। नुकीले-सुईनुमा पत्तों से लथपथ, बर्फ की चादर ओढ़े सीधे-सपाट। पर कभी सोचा है सनोबर क्या सोचता है?”
“नहीं”
“असल में सनोबर कुछ नहीं सोचता, सिर्फ सहता है। बिल्कुल मेरी तरह। उसे पता है, ये जानलेवा खूबसूरती एक दिन उसकी जान ले लेगी।”
हम कदम-कदम बारादरी पर टहल रहे थे।
“लोग बर्फ में लिपटे सनोबर को देखकर खुश होते हैं पर सनोबर सिर्फ इंतजार कर रहा होता है, सर्दी के आखिरी हिमपात का, जो उसके सारे पत्ते गिरा देगा। सनोबर नंगा हो जायेगा- बिल्कुल सड़क के अगल-बगल डेरा डाले इन बेसहारा भिखारियों की तरह। वो बिना उफ तक किये ठिठुरता रहता है। इंतजार करता है गर्मियों का, जब वह आजाद हो जायेगा अपने नंगेपन से।“ उसी दार्शनिकता भरी बातें अब भी मेरे लिये पहेली ही थी।
“चलो अब वापस चलते है” मैंने कहा।
“हाँ! चलो। बाबा को हाजत भी आयी होगी। वार्ड में आकर मैं अपने काम में लग गया। उसके बाबा वार्ड में दो दिन भर्ती रहे। मैं वार्ड में अक्सर उससे बात करने से कतराता और वैसे उसे इतना टाइम भी नही मिल पाता था। वो दौड़ी-भागी हुई सी आती। जाँचे जमा कराती, दवा लाती और दिन भर अपने बाबा की सेवा में लगी रहती। ऐसा करीब छः महीने तक चलता रहा। वो आती। अपने बाबा को कीमो चढ़वाती और चली जाती।
मैं सैकण्ड ईयर में आ गया था। पूरा वार्ड अब नये जूनियर्स के हवाले था। एक दिन मैं ओ. पी. डी. में बैठा था। वो बदहवास सी मेरे पास आई।
“Sir! I need Your help”
“मेरे बाबा सीरियस हैं और मेल वार्ड में एक भी बेड खाली नहीं हैं।”
”ठीक हैं, मैं कुछ करता हूँ। तुम उन्हें लेकर आओं” मैने उनके वाइटल्स चेक किये। वाकई में उसके बाबा की हालत सीरियस थी। मैंने उन्हें SEMI-ICU में भर्ती ले लिया। उनके पूरे शरीर में सूजन थी। शायद किडनी ठीक से काम नहीं कर रही थी। दर्द भी मोर्फीन देने के बावजूद कन्ट्रोल नहीं हो रहा था।
“शायद इनकी किडनी ठीक से काम नहीं कर रही है। सोनोग्राफी करानी पड़ेगी” मैंने उसे सोनाग्राफी और जाँचों की पर्ची भरकर पकड़ा दी। वो स्ट्रेचर को घसीटती हुई उन्हें सोनाग्राफी के लिये ले गयी। मैं वापस ओ. पी. डी. आ गया। दो दिन में उनके पैरों की सूजन कम हो गई और पेशाब भी ठीक से आने लगा था।
संडे का दिन था। ग्यारह बजे ओ.पी.डी. खत्म हुई| मेरे सभी साथी डॉक्टर्स जा चुके थे। मैं किसी काम से वार्ड में ही रुका हुआ था। वो मेरे पास आई और बोली-
“मुड्डा क्लब?”
“ठीक है, चलो।” मैं उसके साथ हो लिया।
“वैसे तुम्हारी आँखों में काजल अच्छा लगता है। लगाया करो।”
“मैं मेक अप नहीं करती, और by the way! ये काजल नहीं आखिरी हिमपात का संकेत है।”
“ऐसा नहीं है। तुम्हारे बाबा की condition अब पहले से ठीक है।”
“हम्म…………..”
मुड्डा क्लब आ गया था। उसने अपनी सिगरेट जला ली। एक कोने में खाली टेबल देख, हम वहाँ बैठ गये। थोडी देर वो बिना पलक झपकाये मुझे देखती रही। उसकी छोटी-छोटी आँखे आज बड़ी ही खूबसूरत लग रही थी।
“आपको फ्लर्ट करना नहीं आता क्या?”
“ये कैसा Question है?”
“बिलकुल सीधा Question है, आपकी ही तरह”
“मैं शादीशुदा हूँ।”
“हाऊ स्वीट……….। मुझे तो लगा था कि तुम कहोगे कि मेरी शक्ल तुम्हारी एक्स-गर्लफ्रेण्ड से हूबहू मिलती है। उसकी बात सुनकर मेरे चेहरे पर हल्की सी मुस्कान दौड़ गयी।
“ये सच है। तुम्हारी शक्ल मेरी एक्स-गर्लफ्रेण्ड से हूबहू मिलती है।”
“सच में! ओह माई गोड! वो लिखखिलाकर हँस पड़ी।
“वैसे मुझे तुम्हारे जैसे लड़के का हमेशा इंतजार रहेगा।” वो सीरियस थी।
“वैसे बाबा अब दो-चार दिन से ज्यादा नहीं चलेंगे ना”
“कुछ कह नहीं सकते। सीटी स्कैन की रिपोर्ट के अनुसार उनकी एक किडनी काम नहीं कर रही है।” मैने जवाब दिया। मेरा जवाब सुनकर वो चुप हो गई उसकी आँखों में आँसू आ गये। उसने बोलना शुरू किया-
“मैं अपने बाबा की नाजायज औलाद हूँ। बाबा प्राईमरी स्कूल में मास्टर हैं। माँ को दूसरी बार भी लड़का न होने पर उन्होंने दूसरी शादी कर ली। हमें घर से बाहर निकाल दिया गया। तब से लेकर आज तक वो कभी भी हमसे मिलने नही आये। हमें उनकी शक्ल तक से नफरत हो गयी। एक दिन पता चला कि उन्हें कैंसर है। उनके बेटे-बेटियों ने उन्हें मरने के लिये अकेला छोड़ दिया। उनकी दूसरी बीवी अपने मायके चली गयी। मुन्नाभाई ने कहा था कि अगर कोई आप के एक गाल पर थप्पड़ मारे तो हमें अपना दूसरा गाल भी आगे कर देना चाहिए। मैं उन्हें उनकी नफरत से सौ गुणा प्यार देना चाहती हूँ। पिता एक बरगद के पेड़ की तरह होता है। थोड़े दिनों में ही आखिरी हिमपात होगा। उनके बेटों को उनकी जगह नौकरी मिल जायेगी। मैं आजाद हो जाऊँगी।” उसकी आँखों से काजल आँसूओं के साथ धुलकर बह चला था।
तीन दिन बाद मैं दो दिन की छुट्टी लेकर किसी काम से गाँव आ गया। उसके बाबा की हालत स्टेबल थी। छुट्टियों के बाद वापस जाकर देखा तो SEMI-ICU में उसके बाबा का बेड खाली था। मैंने सिस्टर से पूँछा तो सिस्टर ने एक चिट मेरे हाथ में थमा दी।
“आखिरी हिमपात हो गया डॉक्टर साहब। सनोबर अब पूरी तरह आजाद है। कभी रणतभँवर घूमने आओं तो जरूर याद करना। मैं होटल “टाइगर व्यू” में रिसेप्सनिस्ट की जॉब करती हूँ।
मेरी आँखों के सामने शिमला का दृश्य उभर आया। बर्फबारी हो रही है और Pine Tree मजबूती से खड़ा है।…………….नंगा………बिल्कुल नंगा।
डॉ सुभाष जोनवाल
