कविता

पापा

पापाअब जब आप चले गए हैंतो मैं देख रहा हूँ किपहले की ही तरह भोर हो रही हैपंछी चहचहा रहे हैंलोग टहल रहे हैंपर...

आरवी के लिए

प्रिय आरवीतुम ये अफ़सोस के साथकहती हो किमैंने लिखी हैं तुम्हारे लिएसिर्फ़ दो नज़्मऔर उलाहना देती हो किआये बड़े लेखक! पर जब कभी तुम पढ़ोगी"मैं...

नवीन रांगियाल की कविताएँ

और उसे खो देता हूँसारी देह को समेट करजब वह उठती है बिस्तर से हेयर बैंड को मुँह में दबाएअपने सारे बालों को बाँधती हैतो...

दीपक सिंह की कविताएँ

1.हो सकता है―प्यार का यह खयाल मुझे घायल कर देफिर भीतुम हो सकती थी मेरे साथघास और मिट्टी के मेरे घर को अपने स्वप्न...

ऊँचाई

ऊँचे पहाड़ पर,पेड़ नहीं लगते,पौधे नहीं उगते,न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ़ बर्फ़,जो कफ़न की तरह सफ़ेदऔर मौत की तरह ठंडी होती हैखेलती,...

चाँद की आदतें

चाँद की कुछ आदतें हैं।एक तो वह पूर्णिमा के दिन बड़ा-सा निकल आता हैबड़ा नक़ली (असल शायद वही हो)।दूसरी यह, नीम की सूखी टहनियों...

प्रचलित