निशान्त जैन की कवितायें

वक़्त कहाँ …

वक़्त कहाँ अब कुछ पल दादी के किस्सों का स्वाद चखूं,
वक़्त कहाँ बाबा के शिकवे, फटकारें और डांट सहूँ।

कहाँ वक़्त है मम्मी-पापा के दुःख-दर्द चुराने का,
और पड़ोसी के मुस्काते रिश्ते खूब निभाने का।

रिश्तों की गरमाहट पर कब ठंडी-रूखी बर्फ जमी,
सोंधी-सोंधी मिट्टी में कब, फिर लौटेगी वही नमी।

जब पतंग की डोर जुड़ेगी, भीतर के अहसासों से,
भीनी-भीनी खुशबू फिर महकेगी कब इन साँसों से।

सूने से इस कमरे में कब तैरेंगी मीठी यादें,
बिछड़े साथी कब लौटेंगे, अपना अपनापन साधे।

कब आएगा समझ हमें, क्या जीवन का असली मतलब,खुशियों को आकार मिलेगा, होंगे सपने अपने जब,

कभी मिले कुछ वक़्त अगर तो, ठहर सोचना तुम कुछ पल,
यूँ ही वक़्त कटेगा या कुछ बेहतर होगा अपना कल।

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मैं शहर हूँ…

मुस्कानों का बोझा ढोए, धुन में अपनी खोए-खोए
ढूँढता कुछ हर पहर हूँ।
मैं शहर हूँ।

बेमुरव्वत भीड़ में,
परछाइयों की निगहबानी,
भागता-सा हाँफता-सा
शाम कब हूँ, कब सहर हूँ,
मैं शहर हूँ।

सपनों के बाजारों में क्या,
खूब सजीं कृत्रिम मुस्कानें,
आँखों में आँखें, बातों में बातें,
खट्टी-मीठी तानें,
नजदीकी में एक फासला,
मन-मन में ही घुला जहर हूँ।
मैं शहर हूँ।

मन के नाजुक से मौसम में,
भारी-भरकम बोझ उठाए,
कागज की क़श्ती से शायद,हुआ है अरसा साथ निभाए,
खुद के अहसासों पर तारी,
हूँ सुकूँ या फिर कहर हूँ।
मैं शहर हूँ।


आओ मन की परतें खोलें…

लाल-लाल से बादल ऊपर,
और नीचे धानी सी चादर,
दूर क्षितिज पर ढलता सूरज,
क्या कहता है हौले-हौले।
आओ मन की परतें खोलें।

जिनका जीवन है पहाड़ सा,
पर चेहरों पर मुस्कानें हैं,
उन मुस्कानों की मिठास को,
आओ अपने संग संजो लें।
आओ मन की परतें खोलें।

मिट्टी की सोंधी खुशबू में,
जीवन की हर महक बसी है,
इस मिट्टी का कतरा-कतरा,
लेकर जीवन में रस घोलें।
आओ मन की परतें खोलें।

रिश्तों की मीठी गरमाहट,
अरमानों की नाज़ुक आहट,
खोल के रख दें दिल की टीसें,
मिलकर हँस लें, मिलकर रो लें।आओ मन की परतें खोलें।


अभी उजाला दूर है शायद…

दीवाली-दर-दीवाली ,
दीप जले, रंगोली दमके,
फुलझड़ियों और कंदीलों से,
गली-गली और आँगन चमके।

- प्रचार के बाद पढ़ना जारी रखें -

लेकिन कुछ आँखें हैं सूनी,
और अधूरे हैं कुछ सपने,
कुछ नन्हे-मुन्ने चेहरे भी,
ताक रहे गलियारे अपने।

खाली-खाली से कुछ घर हैं,
कुछ चेहरों से नूर है गायब,
अलसाई सी आँखें तकतीं,
अभी उजाला दूर है शायद।

थकी-थकी सी उन आँखों में,
आओ थोड़ी खुशियाँ भर दें,
कुछ मिठास उन तक पहुँचाकर,
कुछ तो उनका दुखड़ा हर लें।

कुछ खुशियाँ और कुछ मुस्कानें,
पसरेंगी हर सूने घर में,
मुस्कुराहटें-खिलखिलाहटें,
मिल जाएँगी अपने स्वर में।

तभी मिटेगा घना अँधेरा,
तभी खिलेंगे वंचित चेहरे,
रोशन होंगी तब सब आँखें,
तभी खिलेंगे स्वप्न सुनहरे। 

निशान्त जैन
निशान्त जैन
2015 बैच के IAS अधिकारी और लेखक निशान्त जैन का जन्म अक्टूबर, 1986 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ। सिविल सेवा परीक्षा में 13वीं रैंक पाकर वह हिंदी/भारतीय भाषा मीडियम के टॉपर बने। इतिहास, राजनीति विज्ञान व अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएशन और हिंदी साहित्य में पोस्ट-ग्रेजुएशन। हिन्दी साहित्य में NET-JRF उत्तीर्ण और दिल्ली यूनिवर्सिटी से M.Phil. की उपाधि। सिविल सेवा में चयनित होने से पहले लोक सभा सचिवालय की संपादन-अनुवाद सेवा में नौकरी की। LBSNAA में IAS ट्रेनिंग के उपरांत JNU से पब्लिक मैनेजमेंट में मास्टर्स डिग्री प्राप्त हुई। मोटिवेशनल किताब ‘रुक जाना नहीं’ हिंद युग्म/वैस्टलैंड बुक्स से प्रकाशित। शोधपरक किताब ‘राजभाषा के रूप में हिंदी’ नेशनल बुक ट्रस्ट, भारत सरकार से और बाल कविता संकलन ‘शादी बंदर मामा की’ प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित। UPSC परीक्षा की तैयारी के लिए बेस्टसेलर किताब 'मुझे बनना है UPSC टॉपर' (प्रभात प्रकाशन) बेहद लोकप्रिय। राजकमल प्रकाशन से ‘सिविल सेवा परीक्षा के लिए निबंध’ नामक पुस्तक सम्पादित। यूट्यूब व सोशल मीडिया पर लेक्चर/वीडियो काफ़ी लोकप्रिय। कविताएँ व ब्लॉग लिखने और युवाओं से संवाद स्थापित करने में रुचि। ब्लॉग- nishantjainias.blogspot.com ई-मेल- nishantjainias@gmail.com