बाढ़ में

उस मुहल्ले का सबसे ऊँचा स्थान वहाँ का मंदिर है। उस मंदिर की मूर्ति के गले तक पानी पहुँच गया है। पानी सर्वत्र पानी ही पानी ! मुहल्ले भर के अधिकांश निवासी अब तक स्थल की खोज में भाग चुके हैं। घरों की रखवाली के लिए नाववाले इक्के-दुक्के व्यक्ति तो ठहरे हुए हैं। मंदिर की छत की तीन कोठरियों में सड़सठ बच्चे हैं। तीन सौ छप्पन इनसान, कुत्ते, बकरियाँ, बिल्लियाँ, मुर्गे आदि पालतू जानवर भी हैं। सब-के-सब एक-दूसरे से हिल-मिलकर। किसी प्रकार का झगड़ा ही नहीं।

चमार चेन्नन पिछली सारी रात और आज का पूरा दिन पानी में खड़ा है। उसकी अपनी नाव नहीं। आज पूरे तीन दिन हुए उसके मालिक अपने प्राण लेकर भाग खड़े हुए। कोठरी के अंदर पानी घुस जाने की आशंका होते ही लकड़ी आदि के सहारे उससे ऊपर एक अभय स्थान निर्मित हो चुका था। जल्दी ही पानी उतर जाएगा। इस प्रतीक्षा में वह दो दिन से उस पर सिकुड़ा हुआ समय बिता रहा था। घर के सामने दो-चार फलोंवालों केले और एक-दो फूस के ढेर भी लगे हैं। यदि वह भी उधर से प्राण रक्षार्थ चला जाए तो ये केले और फूस के ढेर कोई बदमाश लूट ले जाएगा।

अब उस स्थान के ऊपर भी घुटने तक पानी पहुँच गया। छप्पर पर लगे नारियल के पत्तों की दो पत्तियाँ पानी में हैं। चेन्नन चीत्कार कर उठा। कौन सुननेवाला है वह आर्तनाद, कौन है उसके पास? उसकी पूर्ण गर्भवती स्त्री, चार संतानें, एक बिल्ली और एक कुत्ता, बस इतने जीव उसके आश्रय में हैं। उसको मालूम हो गया कि छप्पर तक पानी के पहुँचने में चार पहर की भी जरूरत नहीं पड़ेगी और अपने तथा अपने कुटुंब का अंत अब-तब हो सकता है। अभी तीन दिनों से लगातार मूसलधार पानी बरस रहा है। छप्पर के नारियल के पत्तों को हटाकर चेन्नन किसी तरह बाहर आया और चारों ओर देखने लगा। उत्तर की तरफ से एक बड़ी नाव जा रही है। मल्लाहों को लक्ष्य करके चेन्नन ने अपनी सारी शक्ति लगाकर आवाज लठाई। भाग्य से मल्लाहों ने आवाज सुन ली। वे नाव को उसके पास ले आए। तब तक छप्पर के नारियल के पत्तों के बीच से चेन्नन ने अपनी बीवी बच्चों, बिल्ली और कुत्ते को एक-एक करके बाहर खींच लिया था। इतने में नाव भी उसके समीप आ गई।

उसके बच्चे नाव में चढ़ रहे थे। इतने में पश्चिम दिशा से किसी की पुकार उठी, “चेन्नन दादा!” चेन्नन का ध्यान उस ओर गया। “यहाँ से होकर!” वह उसका पड़ोसी कुंजेप्पन है। चेन्नन ने जल्दी में अपनी बीवी को भी नाव में बिठा दिया। मौका पाकर बिल्ली भी उसमें घुस गई। कुत्ते की खबर किसी को उस समय नहीं हुई। वह उस छप्पर के पश्चिम की तरफ जहाँ-तहाँ सूँघता जा रहा था।

नाव चलने लगी; वह दूर हो गई। कुत्ता छप्पर पर लौट गया। चेन्नन की नाव बहुत दूर हो गई; उसकी चाल बड़ी तेज थी, मानो उड़ रही हो। मृत्यु भय से कुत्ता दर्द भरी चीत्कार करने लगा। उस चीत्कार की वेदनापूर्ण शब्दावलियाँ किसी निस्सहाय मानव के आर्तनाद की शब्दावलियों से मिलती-जुलती थीं; लेकिन उसका आर्तनाद सुनने के लिए कौन है वहाँ! छप्पर के चारों ओर भागता रहा, जगह-जगह पर वह सूँघता था, चिल्लाता भी।

एक मेंढक, जो छप्पर पर निश्चिंत बैठा था; इस अप्रतीक्षित हलचल को देख सहम उठा और कुत्ते के सामने से ही पानी में ‘धुडीम’ की आवाज कर कूद पड़ा। कुत्ता भय से चौंक पड़ा और पीछे की ओर भाग गया और जल की तरंगों को देर तक घूरता हुआ खड़ा रह गया।
वह जानवर जहाँ-तहाँ शायद खाने की खोज में होगा, सूँघता फिर रहा है। एक मेंढक उसके नासारंध्र में पेशाब करके पानी में कूद गया। अस्वस्थ कुत्ता छींकने तथा नथुनों को फटकारने लगा। मुख छप्पर पर मार-मारकर भौंकता रहा। सामनेवाले एक पैर से मुख पोंछने लगा।
मूसलधार वर्षा शुरू हुई। कुत्ते ने अपने सिर को पैरों के बीच में दबाकर बड़ी भारी मुसीबत झेल ली। उसका मालिक अंपलप्पुषा पहुँच गया था।
रात हो गई। एक भीषण मगरमच्छ पानी में डुबकियाँ लेता हुआ उस झोंपड़ी से टकराता हुआ आहिस्ते-आहिस्ते निकल गया। भयाधिक्य से दुम दबाकर कुत्ता भौंक उठा। मगरमच्छ उसकी परवाह क्यों करने लगा? वह तैरता गया। झोंपड़ी की चोटी पर बैठा-बैठा भूख से पीड़ित वह कुत्ता काले-काले बादलों से घिरे हुए अंधकारपूर्ण भयानक अंतरिक्ष की ओर देखकर क्रंदन करने लगा। उस कुत्ते का दीन रोदन मुहल्ले में दूर तक गूंज उठा। वायुदेव ने उस करुणस्वर को फैलाने में बड़ी हमदर्दी दिखाई। घरों की रखवाली के लिए ठहरे हुए कुछ भलेमानुसों ने कहा होगा कि हाय! हाय! छप्पर पर बैठा वह कुत्ता रो रहा है। बहुत दूर कहीं ठिकाने पर उसका मालिक ब्यालू कर रहा हो। खाना खाकर आज भी एक कौर नियमानुसार उसको खिलाने के लिए बना रहा होगा।

बड़ी देर तक जोर से लगातार वह कुत्ता रोता रहा। आवाज धीमी होती-होती बिल्कुल रुक गई। उत्तर की तरफ के किसी घर का पहरेदार रामायण पढ़ता है। कुत्ता निःशब्द होकर उस ओर देखने लगा, मानो उसे ध्यान से सुन रहा हो। थोड़ी देर के बाद फिर वह बेचारा जीव गला फाड़कर देर तक रोता रहा।

उस निशीथिनी की निःशब्दता में श्रुति-मधुर रामायण पाठ फिर एक बार सब कहीं फैल गया। कुत्ता वह मानव शब्द गौर से सुनता हुआ देर तक निश्चल खड़ा रहा। एक शीत मारुत प्रवाह में वह शांत मधुर पारायण विलीन हो गया। वहाँ के चीत्कार तथा तरंगों से उठती ‘कल-कल’ ध्वनि के अलावा कुछ भी नहीं सुनाई पड़ता था।
झोंपड़ी की चोटी पर चेन्नन का कुत्ता लेटा हुआ है। वह लंबी-लंबी ऊष्मल साँस लेता रहा। बीच में न जाने, क्या बक रहा है। एक मछली झपट पड़ी, कुत्ता एकदम उठ खड़ा हो गया, भौंकने लगा‌ और कहीं मेढक कूद पड़ा; अस्वस्थ कुत्ता गुर्राने लगा।

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सबेरा हुआ। धीमे स्वर में वह रोने लगा। उसकी उस समय की आवाज हृदय द्रवीकरण में समर्थ थी। मेढकों ने उसकी ओर घूरकर देखा। जल में कूदकर ऊपर ही ऊपर सरक-सरककर डूबते उन मेढकों को वह निर्निमेष नेत्रों से देखता रहा। नारियल के पत्तों की उन पंक्तियों की तरफ, जो जल-वितान से ऊपर-ऊपर दिखाई देती थीं, वह टकटकी बाँधकर देखने लगा। सर्वत्र शून्यता
है। कहीं भी आग जलने का निशान नहीं दिखाई देता। उन मक्खियों को, जो उसके शरीर से खून चूसने में स्वच्छंदता से लगी थीं; वह दाँतों से नोचकर खा जाता और अपनी दाढ़ी में लगी मक्खियों को पीछे के पैरों से खरोंच डालता।
थोड़ी देर के लिए सूरज चमक पड़ा। उस मंद धूप में वह लेट गया और सोने की चेष्टा करने लगा। मंदानिल में हिलते केले के पत्तों की छाया छप्पर पर हिलती-डुलती दिखाई देती थी। वह उठ बैठा और जोर से भौंकना शुरू किया।
अचानक सूरज बादलों के पीछे छिप गया। सर्वत्र अंधकार छा गया। हवा ने लहरों को भड़का दिया। जल के ऊपर से जीवों की लाशें बह रही हैं। लहरों में उठती- डूबती तेजी से बहती जा रही हैं। वे यत्र-तत्र स्वच्छंद चल रही हैं।
उन्हें किसी का खौफ नहीं। लालसा भरी दृष्टि से उसने उन्हें देखा। कुत्ता न जाने क्या बकने लगा।
एक छोटी सी किश्ती दूर से होकर द्रुतगति में जा रही है। कुत्ता खड़ा हो गया और पूँछ हिलाने लगा। उसकी निगाह उस किश्ती की गति में लगी हुई थी। देखते-ही-देखते वह किश्ती नारियल के पेड़ों के झुंड में ओझल हो गई।
बारिश शुरू हुई। पीछे के पैरों को टेककर आगे के पैरों के बल कुत्ता बैठ गया और चारों ओर देखने लगा। उसकी आँखों में ऐसी निस्सहायता झलकती थी, जो सबको हठात् रुला देने की क्षमता रखती थी।
बारिश खत्म हुई। एक छोटी सी नाव उत्तर की तरफ से आई और एक नारियल के पेड़ के नीचे लग गई। कुत्ता पूँछ हिलाता हुआ जम्हाई लेकर अस्पष्ट स्वर सुनाने लगा। नाव खेनेवाला पेड़ पर चढ़कर नारियल तोड़ उतर आया। नाव में बैठकर उसने नारियल काटकर पानी पी लिया और नाव खेकर आगे बढ़ गया।
एक कौआ, जो दूर किसी पेड़ पर बैठा था, उड़ता हुआ आया और एक बड़े भारी भैंसे की सड़ी लाश पर बैठ गया, जो पानी के ऊपर-ऊपर बह रही थी। चेन्नन का कुत्ता लालसावश भौंकता ही रहा कि वह कौआ लाश पर चोंच चलाने लगा और मांस तोड़-तोड़कर खाने लगा। उसे किसी की परवाह नहीं थी। पेट भरा और वह खुशी-खुशी उड़ गया।
एक तोता उस झोंपड़ी के पास के केले के पत्ते पर आ बैठा और चहचहाने लगा। कुत्ता अस्वस्थ होकर भौंक उठा। वह तोता भी उड़ गया।
उस बरसाती बाढ़ में चींटियों का जो छत्ता फँस गया था, वह बहता-बहता उस छप्पर से अटक गया। कुत्ता उसे यह सोचकर चूमने लगा, मानो उसे खाने की कोई वस्तु मिल गई हो। फिर क्या था? वह चौंक पड़ा और नथुना जोर-जोर से फटकारने लगा। उसका मृदुल मुँह चीटियों की काट से लाल-लाल हो उठा और सूजन भी होने लगी।
दोपहर के बाद दो आदमी एक छोटी नाव लेकर उस ओर से आए। कृतज्ञ की भाँति कुत्ता भौंका, दुम हिलाई और मनुष्यों की भाषा से मिलती-जुलती जुबान में कुछ कहने लगा। वह पानी में उतर पड़ा और नाव में कूदने की तैयारी करने लगा।

“देखो! एक कुत्ता खड़ा है, “एक ने कहा। कुत्ता कृतज्ञता-सूचक स्वर सुनाने लगा, क्योंकि उसे ऐसा लगा, मानो वह व्यक्ति उसके प्रति सहानुभूति रखता है।
दूसरे व्यक्ति ने जवाब दिया, “खड़ा है तो खड़ा रहने दो।” कुत्ते ने अपना मुँह खोला और बंद कर लिया, मानो कोई चीज गले के नीचे उतार रहा हो। उसके बाद कुछ आवाज ऐसी सुनाई, मानो प्रार्थना कर रहा हो और दो बार वह कूद पड़ने को हुआ।

नाव दूर होती गई। कुत्ते ने और एक बार क्रंदन किया। नाव खेनेवालों में एक ने पीछे मुड़कर देखा।
“हाय!”
यह उसकी आवाज नहीं थी। उस कुत्ते की आवाज थी।
“हाय!”
थका-माँदा उसका हृदयविदारक दीन रोदन हवा में लीन हो गया। वीथियों में कभी न थमनेवाली ध्वनि! फिर किसी ने भी मुड़कर नहीं देखा। नाव के ओझल होने तक कुत्ता ज्यों-का-त्यों खड़ा रहा। बक-बक करता हुआ वह छप्पर पर चढ़ा, मानो संसार से अंतिम विदाई ले रहा हो। शायद वह यह सोच रहा होगा कि मैं आगे कभी भी मनुष्य से प्यार नहीं करूँगा।
थोड़ा सा ठंडा पानी चाटकर पी लिया। वह निस्सहाय जीव ऊपर से उड़ते हुए पक्षियों की ओर देखने लगा। वीचियों में हिलता-डुलता एक छोटा सा विषहीन साँप दिखाई दिया। कुत्ते ने छलाँग मारी, छप्पर की चोटी पर ! जिस द्वार से चेन्नन और उसका परिवार बाहर निकला था, उस द्वार से होकर वह साँप रेंग-रेंगकर भीतर घुसा। कुत्ते ने उस द्वार से भीतर की ओर झाँककर देखा। एकदम क्रूर बनकर वह भौंकने लगा और न जाने क्या बक पड़ा। उसमें प्राणभय तथा भूख भरी थी। कोई भी भाषाभाषी या कोई भी अन्य ग्रहवासी उसका मतलब समझ सकता था। वह भाषा ऐसी ही सर्वविदित भाषा थी।

रात हो‌ गई। भयानक आँधी तथा मूसलधार वर्षा शुरू हुई। तरंगों की चोट खाकर उस कमजोर झोंपड़ी का छप्पर हिल रहा था। दो बार कुत्ता पैरों के फिसलने से गिरने को हुआ। एक लंबा सिर जल के ऊपर उठा। वह एक मगरमच्छ का सिर था। कुत्ता प्राणभय से भौंकने लगा। कहीं से झुंड के झुंड मुरगों की बाँग की ध्वनि सुनाई पड़ने लगी।
“यह कुत्ता कहाँ भौंक रहा है, यहाँ से लोग कहीं भाग गए क्या ?” केले के पौधे से लगी एक नाव पड़ी है, जिसमें नारियल, केले, फूस आदि भरे हैं। उस नाव के खेनेवालों की ओर मुँह करके कुत्ता भौंकने लगा। क्रुद्ध होकर पूँछ उठाए पानी के करीब खड़ा भौंक रहा था। नाव खेनेवालों में एक केले के पौधे पर चढ़ने लगा।

“यार! मालूम होता है कि यह कुत्ता हमारी तरफ झपट पड़ेगा।” हाँ, कुत्ता एकदम उनकी ओर लपक पड़ा। जो व्यक्ति केले के पौधे पर था, वह डर गया और पानी में गिर गया। दूसरे ने उसे खींचकर नाव पर चढ़ा लिया। कुत्ता इस बीच तैरता तैरता छप्पर पर पहुँचा और तन हिलाता हुआ जोर-जोर से भौंकने लगा।

चोरों ने सभी केले काट लिये। गला फाड़-फाड़कर भौंकते उस कुत्ते को लक्ष्य करके वे बोले, “तेरी खबर अभी ली जाएगी। थोड़ी देर अभी ठहर जा।” बाद में उन्होंने सारा फूस नाव में चढ़ा लिया। अंत में एक व्यक्ति छप्पर पर चढ़ने लगा। कुत्ते ने अपनी बची-खुची सारी ताकत लगाकर उसके पैर को जोर से काट लिया। उसे मुँह भर मनुष्य मांस मिल गया। वह आदमी चीख
मारकर नाव में कूद पड़ा। नाव पर खड़े दूसरे व्यक्ति ने एक लंबी मजबूत छड़ी से उस कुत्ते के पेट को लक्ष्य करके प्रहार किया। “बाऊँ, बाऊँ!” शब्द धीरे-धीरे कम होता-होता अंत में एक प्रकार की अव्यक्त बक बक में परिणत हो गया। वह व्यक्ति नाव में लेटा रो रहा था, जिसे उस कुत्ते ने काट खाया था। ‘चुप रह कोई…” दूसरे ने चेतावनी दी। फिर वे उधर से अपनी नाव लेकर भाग निकले।

बड़ी देर के बाद कुत्ता उठा और जिस ओर नाव जा रही थी, उस ओर देखकर जोर से भौंकने लगा।
आधी रात का समय। एक मरी भारी गाय बहती-बहती उस झोंपड़ी से उलझ गई। कुत्ता छप्पर की चोटी पर खड़ा वह दृश्य देख रहा था। नीचे नहीं उतरा। धीरे-धीरे वह लाश हट रही है। गुर्राता हुआ कुत्ता छप्पर पर लगे नारियल के पत्तों को पैरों से नोचने लगा। लगा पूँछ हिलाने। ज्यों ही लाश हटती जा रही थी, त्यों ही कुत्ता धीरे-धीरे नीचे को उतर आया और झाँककर लाश पर मुँह लगाया। अपने पास खींच लिया और खुशी से खाने लगा। कई दिनों की भूख के लिए पर्याप्त भोजन।

‘ठे’ एक भारी प्रहार। कुत्ता एकदम नदारद। गाय की वह लाश थोड़ी देर के लिए जल में विलीन हो गई और फिर आगे की ओर बहती हुई दिखाई देने लगी। आँधी की जोरदार ध्वनि! मेढकों के टर्र-टर्र शब्द! तरंगों का हिलना!! अलावा इनके और किसी की आवाज ही नहीं। सर्वत्र नीरवता-ही-नीरवता है। घर की रखवाली में लगे उस हृदयालु कुत्ते की निस्सहाय स्थिति को स्पष्ट करनेवाली वह दर्द भरी पुकार फिर न उठी। सड़ी-गली लाशें इधर-उधर से होकर अनेक वह गईं। किसी-किसी लाश पर बैठे कौए चोंच चलाते अवश्य दिखाई देते हैं। किसी ने उन्हें तंग नहीं किया। चोरों को अपने चौरकर्म में रुकावट न हुई। सब शून्य।

थोड़ी देर के बाद वह झोंपड़ी भी उखड़ गई। पानी में डूब गई। उस सकीम जलवितान में कुछ भी नहीं दिखाई पड़ा। उस स्वामिभक्त कुत्ते ने जिंदगी भर अपने मालिक के मकान की रखवाली की। वह चल बसा। जब तक वह मगरमच्छ का शिकार नहीं बना था, तब तक वह झोपड़ी, मानो कुत्ते के लिए जल के ऊपर खड़ी रही। अब वह भी गिरी। पानी में बिल्कुल डूब गई।
पानी उतरने लगा। चेन्नन कुत्ते की खोज में तैरता-तैरता अपनी झोपड़ी की ओर आ रहा है। एक नारियल के पेड़ की जड़ पर कुत्ते की लाश पड़ी है। तरंगे उसको जरा-जरा हिला रही हैं। पैर के अंगूठे से चेन्नन ने उसे उलट-पलटकर देख लिया। उसे संदेह होने लगा, यह तो उसी का कुत्ता है। उसके एक कान में घाव लग गया है। खाल गल जाने के कारण यह नहीं समझ सका कि उसका रंग क्या है ।

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तकषि शिवशंकर पिल्लै
तकषि शिवशंकर पिल्लै
मलयालम के सुप्रसिद्ध कथाकार तकषि शिवशंकर पिल्लै का जन्म 1912 में केरल के आलप्पुषा जिले के तकषि गाँव में हुआ। वे अंपलपुषा की अदालत में अधिवक्ता रहे। इसके साथ ही साथ उन्होंने 'तोट्टियुटे मकन्' (भंगी का बेटा), 'रंटिटंगषि' (दो सेर), 'चेम्मीन' (झींगा) 'एणिप्पटिकल्' (सीढ़ियाँ), 'कयर' (रस्सी) सहित बीस से ज्यादा उपन्यास तथा छह सौ से ज्यादा कहानियाँ लिखीं। उत्कृष्ट साहित्य-सेवा के लिए उन्हें 'केरल साहित्य अकादेमी पुरस्कार', केंद्र साहित्य अकादमी पुरस्कार', 1984 का 'भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार', 1985 में भारत सरकार ने 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया।