आरवी के लिए

प्रिय आरवी
तुम ये अफ़सोस के साथ
कहती हो कि
मैंने लिखी हैं तुम्हारे लिए
सिर्फ़ दो नज़्म
और उलाहना देती हो कि
आये बड़े लेखक!

पर जब कभी तुम पढ़ोगी
“मैं तुम्हें फिर मिलूँगी”
तब समझ पाओगी
क्या होता है
अमृता होना
क्या होता है
इमरोज होना!

डॉ सुभाष जोनवाल