हारमोनियम

पानी बहने और तारे चमकने की तरह
एक कठिन संगीतहीन संसार में
वह भी बजा कुछ देर तक
वह कमरे के बीचोंबीच रखा था
उजाले में
उसके कारण जानी गई यह जगह
लोग आते और उसके चारों ओर बैठते

अब वह पड़ा है बाकी सामान के बीच
पीतल लोहे और लकड़ी के साथ
उसे बजाने पर अब राग दुर्गा या पहाड़ी के स्वर नहीं आते
सिर्फ एक उसाँस सुनाई देती है
कभी-कभी वह छिप जाता है एक पुश्तैनी बक्से में
मिजाजपुर्सी के लिए आए लोगों से
बचने की कोशिश करता हुआ

मंगलेश डबराल
मंगलेश डबराल
मंगलेश डबराल समकालीन हिन्दी कवियों में सबसे चर्चित नाम हैं। इनका जन्म १६ मई १९४८ को टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड के काफलपानी गाँव में हुआ था, इनकी शिक्षा-दीक्षा देहरादून में हुई। दिल्ली आकर हिन्दी पैट्रियट, प्रतिपक्ष और आसपास में काम करने के बाद वे भोपाल में मध्यप्रदेश कला परिषद्, भारत भवन से प्रकाशित साहित्यिक त्रैमासिक पूर्वाग्रह में सहायक संपादक रहे। इलाहाबाद और लखनऊ से प्रकाशित अमृत प्रभात में भी कुछ दिन नौकरी की। सन् १९८३ में जनसत्ता में साहित्य संपादक का पद सँभाला। कुछ समय सहारा समय में संपादन कार्य करने के बाद आजकल वे नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े हैं।