नवीन रांगियाल की कविताएँ

और उसे खो देता हूँ
सारी देह को समेट कर
जब वह उठती है बिस्तर से

हेयर बैंड को मुँह में दबाए
अपने सारे बालों को बाँधती है
तो उसकी गर्दन में याद आता है
मंदिर का गुंबद

रात भर से जागी
थकी हुई उसकी मदालस आँखों में
शि‍व ने फूँक दी हो
अपनी निगाह जैसे

सोचता हूँ अपने जूड़े में
कितना कसकर बाँध लेती है
वो अपनी आवारगी

अपने टूटे हुए बालों में
चुनती है एक-एक लम्हा
जो इसी रात
टूट कर बिखरा था
यहाँ-वहाँ
जैसे शि‍व बि‍खेरते हैं
और फिर समेटते हैं ये सृष्टि
बनाते हैं
फिर मिटाते हैं

हमारी दुनिया बनती है
बनते-बनते रह जाती है

उस क्षण
कितनी चाहत भरी थी
तुम्हारी देह में
कि‍तना शोर था
मेरे हाथों में

चाह और शोर के इस द्वन्द्व में

- प्रचार के बाद पढ़ना जारी रखें -

मैं बार-बार बिखरता और सँभलता हूँ उसके साथ

वहीं उसके क़रीब
इस बिखरी हुई दुनिया में
अपने आज्ञाचक्र पर
टि‍क कर बैठ जाता हूँ

उसके प्यार में
पा लेता हूँ अपना ईश्वर
और
उसे खो देता हूँ


चाय

चाय
देश के लिए एक संभावना है
चाय न हो तो राष्ट्रीय अख़बार अधूरे हैं
सरकार के खिलाफ़ उफनता विमर्श है चाय
नेताओं को दी गईं गालियों का स्वाद है
संभावित प्रेम
बातों की गुंजाइश है चाय
प्यार करने और साथ रहने का बहाना है
जहाँ तक ज़िंदगी की बात है
जब तुम मेरे लिए कम चीनी वाली चाय बनाती हो
तो मैं समझ जाता हूँ
कि सबकुछ ठीक नहीं है
चाय मिले तो सहूलियत
न मिले तो दुश्वारियाँ हैं
ज़िदगी की तलब है चाय
चाय अदरक वाली कविता है
अजनबी से मुलाक़ात है
एक बार मिलने पर
फिर से मिलने का वादा देती है
चाय हो तो अकेला आदमी उतना अकेला नहीं
जितना चाय के बगैर नज़र आता है
चाय पीता हुआ आदमी
पूरा आदमी है
चाय महज़ चाय नहीं
मिलने और बिछड़ने से पहले
एक मुलाकात है चाय
क्‍या किसी दिन
मुझसे चाय पर मिलने आओगी तुम?


दो टुकड़े
तुम अकेले हो?
शायद नहीं
अपने अकेलेपन को तोड़कर
दो टुकड़े कर लो
तुम्‍हारे पास आ जाएगा
एक और अकेलापन


पुकारना

जिसे पुकारा
वो खो गया
पुकारना
गुम हो जाना है

मैंने कहा सफ़र
तो सड़कें गुम हो गईं

नदी कहा
मैं डूब गया पानी में

मैं बहुत गहरे तक धंस गया
जब मैंने कहा पहाड़

रंग कहा
तो मैं सिमट आया उसकी कत्थई आँखों में

- प्रचार के बाद पढ़ना जारी रखें -

मैंने एक बार कहा था दिल
उसके बाद मैं अकेला रह गया

प्‍यार कहने पर
तुम चली गई

मैंने कहा तुम्हारी याद
तो गुम हो गया मैं

मैंने सुना एक बार नाम तुम्‍हारा
लेकिन, पुकारा नहीं

मैं नाम को तुम्हारे देखता हूँ
बस, देखता ही रहता हूँ


मुझे हैरत में डालो
ज़ालिमों मुझे गुस्‍से से भर दो
मैं किसी मजलूम के काम आऊँ

रिंदों मेरा जाम पूरा भर दो
मैं बेहोश हो जाऊँ
मैं बेहोश हो जाऊँ

जानवरों मुझे दो मनुष्‍यता
मैं आदमियों के काम आऊँ

औरतों मुझे दो करूणा
मैं कभी मैला न कर सकूँ किसी का मन

आशिकों मुझे पागलपन दो
मैं प्‍यार करूँ— बदले में कुछ न चाहूँ

उदासियों मुझमें जमा हो जाओ
मैं मुस्‍कराऊँ तो उसे अच्‍छा लगूँ

किताबों मुझे सवाल दो
थकानों झपकियाँ दो
जमानों मुझे याद दो

- प्रचार के बाद पढ़ना जारी रखें -

दुनिया के तमाम जादूगरों
मुझे हैरत में डालो

आसानियों मुझे मुश्किलें दो
मैं फिर उठूँ — मैं फिर चलूँ

चिताओं मुझे होश दो
मैं तैयार रहूँ — मैं तैयार रहूँ

समय मुझे उम्र से भर दो
मैं बड़ा काम करूँ
मैं मर जाऊँ — मैं मर जाऊँ


मृत्‍यु
मृत्‍यु मेरा प्रिय विषय है
लेकिन
मैंने कभी नहीं चाहा
कि मैं मर जाऊँ
इतनी छोटी वजह से
जहाँ
केवल दिल ही टूटा हो
और
शेष
पूरी देह
सलामत हो


एक अदद चाय
दो घड़ी तुम्हारे साथ के लिए कैसी प्रार्थनाएँ?
प्यार के लिए कैसी गुज़ारिश?

ये क्या बात हुई कि तुम्हारा हाथ थामने से पहले
छूने होंगे
फूलों से ढकने होंगे देवताओं के चरण

क्या इसलिए दुनिया में आया था ईश्वर
कि तुम्हारे साथ एक ठीक ठाक दिन के लिए
उसके कानों में बुदबुदाऊँ अपनी इच्छाएँ
धूप- बत्ती से उसकी नाक में दम कर दूँ?

आख़िर इतनी भीड़ क्यों लगा रखी है ईश्वर ने दुनिया में?
जिस तरफ़ सिर झुकाओ कृपा करने खड़े हो जाते हैं!

क्या करना है हमें इतनी कृपाओं का?
जबकि मैं चाहता हूँ
किसी शाम तुम्हारे साथ बालकनी में बैठना
और एक अदद चाय पीना


सतही आदमी

तुम्हारे साथ मैं कितना सतही आदमी था
प्यार, प्यार
और बस प्यार करता रहा

कॉफी
रूमाल
चॉकलेट
और चाभी के छल्लों में गुज़ार दिए दिन

उस थोक बाज़ार में
कितने लोग पहचानने लगे हमें
जहाँ से तुम्हारे स्कार्फ
आई लाइनर और सन कोट ख़रीदे

कई शामें तुम्हारे लिए वो काजल ढूँढ़ने में गुज़ार दीं
जो लंबे वक्त तक टिका रहे तुम्हारी आँखों में

नहीं आने वाले उस अनजान सुख के लिए
कितना वक्त गंवाया हमने साथ-साथ

इस ज़िंदगी में कितनी चीज़ें थीं आसपास
जिनसे नफ़रत कर सकता था मैं
जब तक तुम बिछड़ नहीं गई
यह जान ही नहीं पाया
कि घृणा और प्रतिशोध के भी मूल्य होते हैं

तुमसे अलग होकर ही जान सका
सबसे बुरे होते हैं फूल
बिन बात ही हिलते रहते हैं हवाओं में

अब जबकि मैं प्यार में नहीं हूँ
बादल क्यों बेवजह निकल आते हैं आसमान में?

धूप कितनी क्रूर है
जिस घर में कोई मर गया, उसी के आंगन में खिल आती है

चांद हर शाम पसर आता है छतों पर मातम की तरह

सुख कितना ख़राब लगता है
तुम्हारे बगैर

दुख समृद्ध है
कितना मज़ा देता है अकेले में

यह कविता भी एक सुख है,
लिखकर मिटा दूँगा
बस थोड़ी ही देर में


लुका-छिपी


मैं हासिल की हुई चीजों को भूल जाता हूँ
मुझे याद रहते हैं खोए हुए लोग

पा लेना
खो देने से ज़्यादा ख़तरनाक है
भयावह है किसी का साथ मिल जाना
जितनी बार तुमसे मिलता हूँ
उतनी बार अकेला हो जाता हूँ

इस आकाश को भूल जाने दो हम दोनों की उपस्‍थिति
याद रखो कि इस पृथ्‍वी पर
तुम एक गुम हो चुकी लड़की हो
मैं एक याद में जीने वाला लड़का हूँ

तुम्‍हें पा कर खोना नहीं चाहता
मैं तुम्‍हें खो कर याद रखूँगा

इसके पहले कि प्‍यार हो जाए तुमसे
तुम अभी,
इसी वक्‍त गुम हो जाओ
मैं तुम्‍हें
अभी,
इसी वक्‍त से ढूँढ़ना शुरू करता हूँ


सारे सफ़र ग़लत हो गए

दुनिया में सबकुछ सही चल रहा है

जहाँ कहना था
वहाँ चुप्पियाँ रख दी गईं
जहाँ रोकना था- वहाँ जाने दिया

हर जगह सही बात कही और सुनी गई
सभी ने सबसे सही को चुना

सबकुछ सही तरीके से रखा गया
कहीं भी कोई ग़लती नहीं की गई

नतीज़न सारे हाथ ग़लत हाथों में थे
सारे पांव ग़लत दिशाओं में चल दिए

दुनिया में सारे फैसले सही थे
इसलिए सारे सफ़र ग़लत हो गए

नवीन रांगियाल

पेशे से पत्रकार पहला कविता संग्रह ‘इंतजार में ‘आ’ की मात्रा’ 2023 में सेतु प्रकाशन से प्रकाशित संपर्क : मोबाइल नंबर- 98930-93169 ईमेल : navin.rangiyal@gmail.com