कुमार अंबुज की कवितायें

क्रूरता

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे
तब आएगी क्रूरता
पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा
तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा
वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो
वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा ऋंगार
यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।


उपकार

मुसकराकर मिलता है एक अजनबी
हवा चलती है उमस की छाती चीरती हुई
एक रुपये में जूते चमका जाता है एक छोटा सा बच्चा
रिक्शेवाला चढ़ाई पर भी नहीं उतरने देता रिक्शे से
एक स्त्री अपनी गोद में रखने देती है उदास और थका हुआ सिर
फकीर गाता है सुबह का राग और भिक्षा नहीं देने पर भी
गाता रहता है
अकेली भीगी कपास की तरह की रात में
एक अदृश्य पतवार डूबने नहीं देती जवानी में ही जर्जर हो गए हृदय को
देर रात तक मेरे साथ जागता रहता है एक अनजान पक्षी
बीमार सा देखकर अपनी बर्थ पर सुला लेता है सहयात्री
भूखा जानकर कोई खिला देता है अपने हिस्से का खाना
और कहता है वह खा चुका है
जब धमका रहा होता है चैराहे पर पुलिसवाला
एक न जाने कौन आदमी आता है कहता है
इन्हें कुछ न कहें ये ठीक आदमी हैं
बहुत तेजी से आ रही कार से बचाते हुए
एक तरफ खींच लेता है कोई राहगीर
जिससे कभी बहुत नाराज हुआ था वह मित्र
यकायक चला आता है घर
सड़क पर फिसलने के बाद सब हँसते हैं नहीं हँसती एक बच्ची
जब सूख रहा होता है निर्जर झरना
सारे समुद्रों, नदियों, तालाबों, झीलों और जलप्रपातों के
जल को छूता हुआ आता है कोई कहता है मुझे छुओ
बुखार के अँधेरे दर्रे में मोमबत्ती जलाये मिलती है बचपन की दोस्त
एक खटका होता है और जगा देता है ठीक उसी वक्त
जब दबोच रहा होता है नींद में कोई अपना ही
रुलाई जब कंठ से फूटने को ही होती है
अंतर के सुदूर कोने से आती है ढाढ़स देती हुई एक आवाज
और सोख लेती है कातर कर देनेवाली भर्राहट
इस जीवन में जीवन की ओर वापस लौटने के
इतने दृश्य हैं चमकदार
कि उनकी स्मृति भी देती है एक नया जीवन।

कुमार अंबुज
कुमार अंबुज
कुमार अंबुज (13 अप्रैल 1957) हिन्दी के सुप्रसिद्ध,चर्चित कवि हैं। उनका पहला कविता संग्रह 'किवाड़'1992,जिसकी शीर्षक कविता को भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला। 'क्रूरता' 1996, दूसरा कविता संग्रह है। उसके बाद 'अनंतिम'1998, 'अतिक्रमण'2002 और 2011 में 'अमीरी रेखा' कविता संग्रह विशेष रूप से चर्चित हुए हैं। अलग और प्रशंसित शिल्प-कथ्य की अनेक कहानियाँ पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं, जो संग्रहाकार 'इच्छाएँ' 2008 में आईं। [1] कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार, श्रीकांत वर्मा सम्‍मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्‍मान, केदार सम्मान, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्‍कार और वागीश्‍वरी पुरस्‍कार प्राप्‍त हुए हैं। हिन्‍दी और अंग्रेजी में प्रकाशित अनेक प्रतिनिधि संचयनों में कविताऍं/कहानियाँ शामिल। कुछ कविताऍं और कहानियाँ विभिन्‍न पाठयक्रमों में शरीक। इस तरह कुल पाँच कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह और दो डायरी एवं निबंध संग्रह प्रकाशित हैं।