श्रीमान अ. अपने टी.वी. के सामने बैठे हुए थे।
श्रीमान अ. को शुरू से ही अपना प्रथम नाम पसन्द नहीं था। इसलिए बहुत कम उम्र में ही उन्होंने अ. सहाय लिखना शुरू कर दिया था। न जाने कैसे एक दिन अ. और सहाय के बीच का बिन्दु गायब हो गया और लोग उन्हें ‘असहाय’ कहने लगे। कुछ दिन तो मजाक में निकल गये, लेकिन जब पानी सिर से ऊपर होने लगा, तो श्रीमान अ. सहाय ने तय किया कि अब से वे अपना सिरनाम भी लगाना छोड़ देंगे। तभी से अ. सहाय से वे मात्र श्रीमान अ. हो गये।
तो श्रीमान अ. अपने टी.वी. के सामने बैठे थे। कोई हास्य धारावाहिक चल रहा था। अगर बार-बार विज्ञापन में या उसके नाम के साथ ही यह न कहा जाता कि यह एक हास्य धारावाहिक है, तो यह समझना मुश्किल हो जाता कि वह एक हास्य धारावाहिक है। मुश्किल से ही कोई ऐसा दृश्य होता था जिस पर हंसी आती थी। हालांकि कलाकार अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते थे। चीख चीखकर बोलते थे। गुलाटियाँ खाते थे। किसिम-किसिम से मुँह बनाते थे। कभी-कभी तो एक लम्बी-सी चढ़ी के अलावा बदन के सारे कपड़े उतार डालते थे। पर हंसी नहीं आती थी। लगता था जैसे हँसी भी जिद ठान कर बैठी हो।
लेकिन उस दिन, जिस दिन श्रीमान अ. अपने टी.वी. के सामने बैठे और उस समय, जब टी.वी. पर एक हास्य धारावाहिक चल रहा था, कुछ ऐसा हुआ कि किसी दृश्य को देखकर श्रीमान अ को बहुत मजा आया और उन्होंने जोर से हंसना चाहा। उनका मुंह तो खुला पर हंसी नहीं निकली। श्रीमान अ. को बहुत आश्चर्य हुआ कि इच्छा होने पर भी वे हँस क्यों नहीं पाये! उन्होंने दुबारा हंसने की कोशिश की। पर वे दुबारा असफल हो गये। अब उन्हें झुंझलाहट होने लगी। झुंझलाहट के साथ-साथ एक डर उन पर हावी होने लगा। उन्हें लगा कि उनके अन्दर ज़रूर कोई बड़ी गड़बड़ हो गयी है। उन्होंने आईने के सामने खड़े होकर कई-कई बार कोशिश की, पर सब व्यर्थ। मन ही मन कई नये पुराने चुटकुले याद किये, ये ऐसे चुटकुले थे जिन्हें याद करके वे अकेले में भी हंस लेते थे, लेकिन हँसी नहीं आयी। श्रीमान अ. ने अपने परिवार के डॉक्टर को फोन लगाया। डॉक्टर घर पर नहीं था। जब किसी काम को नहीं बनना होता था तो एक के बाद एक अड़चनें चली आती थीं। इन आने वाली अड़चनों के बारे में कोई भी नहीं जानता था कि वे रहती कहाँ हैं और कब, क्यूं और किन सवारियों पर बैठकर आती हैं। वो जब आ जाती थीं तभी ध्यान जाता था कि लो आ गयीं। डॉक्टर के फोन पर सन्देश छोड़ने के बाद श्रीमान अ. वापस आकर अपने टी.वी. के सामने बैठ गये।
छत पर लगा पंखा धीरे-धीरे चल रहा था। उसकी हवा से टी.वी. के ऊपर रखा जोकर धीरे-धीरे हिल रहा था। श्रीमान अ. को एक बारगी तो लगा कि जोकर उनकी नकल कर रहा है। हालांकि हर खिलौना आदमी की नकल करता हुआ-सा ही लगता था। आदमी भी अजीब शै था। वह हर चीज़ को अपनी ही तरह दिखने और बोलने वाली चीज़ में बदल देना चाहता था। परिन्दों और जानवरों की तो कौन कहे, वह तो पेड़-पौधों से लेकर, मेज कुर्सी तक को अपनी भाषा में बोलता हुआ दिखा देता था। कहानी जब तक छपे हुए हरूफों में थी तो कल्पना के घोड़े दौड़ाने को मैदान बहुत लम्बे चौड़े थे। छवियों में आने के बाद से सोचने की हदबन्दी हो चुकी थी। श्रीमान अ. ने जोकर से अपना ध्यान हटा लिया।
श्रीमान अ. का मन नहीं लग रहा था। उन्होंने टी.वी. बन्द करने को रिमोट उठाया ही था कि टी.वी. पर राष्ट्र अध्यक्ष का चेहरा उभरा। राष्ट्र अध्यक्ष ने सीधे श्रीमान अ. से आँख मिलाते हुए कहा— “घबराओ मत!” श्रीमान अ. अचकचा गये। यह नया अनुभव था। राष्ट्र अध्यक्ष ने कहा- “मैं तुम्हारी परेशानी जानता हूँ। तुम हँस नहीं पा रहे हो न! मैं खुद भी नहीं हँस पाता। क्या राष्ट्र की जनता का यह कर्तव्य नहीं है कि वह भी हँसना छोड़ दे? मैं सोचता था कि लोग अपने कर्तव्य को समझेंगे, पर नहीं समझा लोगों ने। तो हमें मजबूरी में यह कदम उठाना पड़ा। हमने उन प्रविधियों को विकसित किया, जिससे लोगों को हँसी से मुक्त किया जा सके। हँसने से ताकत का अपव्यय होता है। इसलिए हमने तय किया कि अब से कोई नहीं हँसेगा। हँसने की जब कोई बात होगी तो हँसी को टी.वी. पर पीछे से बजा दिया जायेगा। हमने इसलिए सबकी हँसी को टेप में बन्द कर लिया है। इस तरह सब अपनी हँसी को सुन सकते हैं।” इसके बाद एक हँसी बजी और राष्ट्र अध्यक्ष का चेहरा गायब हो गया।
प्रस्तुत कहानी वाग्देवी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किताब ‘कपिल का पेड़’ से ली गयी है।
