दस्तक

रात गहरी हो चली है, सब ठंड से बचने के लिए रजाइयों में दुबक गए हैं।‌ एकाध घंटे पहले कैसी रौनक थी यहाँ, और अब दूर-दूर तक टिमटिमाते तारों के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता। बीच-बीच में कोई कुत्ता भौंक कर इस शांत‌ वातावरण में खलल का काम करता है।‌ बाकी सब कुछ शांत है। मरणोपरांत शांति के जैसा।‌ आज दिवाली है, और अमावस्या की इस अर्ध रात्रि में जब चाँद का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं सब कुछ मनोरम लग रहा है। हालांकि इस‌ पूरे माहौल में हाड़ कंपा देने वाली ठंड ने अपना वर्चस्व बना‌ रखा है। एक भूखा कुत्ता अधबुझी राख के ढेर पर बैठा है। वह कभी-कभी दूर से आती अन्य कुत्तों की आवाज़ में अपना स्वर शामिल करता है, पर परास्त भाव से कुछ ही देर में अपना भौंकना रोक कर चुप हो जाता है। इसी बीच एक दो अधजले पटाखे उसके आसपास अन्य बोझिल गर्म राख में बुझबुझा उठते हैं और कुछ क्षणों को रौशन कर देते हैं।वह काफी देर से भूखा है, न जाने कब अन्तिम बार उसने कुछ खाया था। जब भी खाया हो, पर इस समय वह व्याकुल हो उठा था। उसकी व्याकुलता उसके बेजान स्वर में खीझ की तरह नज़र आ रही थी। उसने थोड़ी ताकत बटोरी और आसपास के घरों की ओर कूच कर गया।लगभग हरेक घर के अंदर रौशनी की कुछ कतार दिखाई दे रही थी, जो दियों को कतार में रखने से बनी थी। उन्हीं में से एक घर पर उसने दस्तक दी। घर पर सभी खाट पर लेटे उंघ रहे थे। घर की सबसे छोटी बेटी शायद कुछ-कुछ जाग रही थी। इधर उसने कुनमुनाते हुए किवाड़ पर पंजों से खरोंचते हुए दस्तक दी। छोटी बेटी उनींदी अवस्था से सचेत अवस्था में आ गई। उसने गौर किया कि कोई किवाड़ पर है। वह आँखें मलती हुई किवाड़ की ओर बढ़ी और देखा कि वहाँ वह खड़ा था। कुनमुनाता हुआ, पंजों से किवाड़ों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करता हुआ। वह उसे पहचानती थी, शायद उसकी भूख भी उसने ताड़ ली। वह जल्दी से भीतर गई। कुछ ढूँढ़ने लगी। कुछ नहीं मिला। खटर-पटर की आवाज़ सुन, माँ की आँख खुल गई। माँ ने आसपास देखा तो कोई न दिखा। वह उधर की ओर हो ली, जहाँ से आवाज़ आ रही थी। देखा कि छोटी बेटी कुछ ढूँढ़ रही है। उसे इस तरह कुछ ढूँढ़ता देख माँ ने पूछा – क्या ढूँढ़ रही हो? बेटी माँ को देखकर सकपका गई – कुछ न बोल सकी। अचानक मुँह खोला तो बोली – कुछ नहीं, भूख लग आई थी‌। माँ ने झिड़कते हुए कहा – कितना खाती है रे तू, रात में भी चैन नहीं है। चल अब सो जा, सुबह खाना।बेटी अनमने मन से माँ के साथ फिर से दियों की कतार के पास से गुज़रते हुए अपनी खाट पर आ गई।थोड़ी देर बाद उसने ध्यान दिया कि कुत्ता बाहर अभी भी भूख से बेहाल हो असहनीय आवाज़ निकाल रहा है।वह फिर से उसके लिए चिंतित हो गई और किवाड़ों की ओर चल दी। वह अभी भी वहीं किवाड़ों की दरारों में पंजे फंसाए बैठा था। लेकिन बेटी के ‌खाली हाथ देखकर उसकी आशा धूमिल हो गई।‌ बेटी फिर से वापस अपनी खाट पर जाकर लेट गई, और मुँह ढककर इस विपदा से स्वयं को दूर करने के लिए बेमन से नींद की गिरफ्त में जाने की तैयारी करने लगी। इधर कुछ देर बाद कुत्ते ने भूख से बे हाल हो फिर से एक बार आख़िरी हुंकार भरी।‌ लेकिन वह इस बार बाहर जाने की मनोदशा में नहीं थी, इसलिए उसके कदम बाहर जाने को न उठ सके। कुत्ते ने फिर कोई हुंकार न भरी, वातावरण में दूर-दूर तक शांति छा गई। बेटी झपकियाँ लेने लगी थी और रजाई से ऊपर तक मुँह ढक लिया था। थोड़ी‌ देर किवाड़ों के पास यूँ ही बैठा रहने के बाद उसे कुछ और कमज़ोरी सी महसूस हुई और वह किसी अन्य घर की ओर मुड़ गया। पर कोई फायदा न हुआ। चारों ओर वीरान सन्नाटा देख उसने वापस लौटने का निश्चय किया। कुछ देर बाद वह वापस लौट आया। रात के इस पहर में हर कोई नींद के आगोश में लिपटा था। कोई उसकी भूख के बारे में इतना व्याकुल नहीं था। वह राख के अधबुझे ढेर पर बैठा, और पैरों में अपना मुँह छिपाए सुबह का इंतज़ार करते हुए सो गया। सुबह हुई धीरे-धीरे सूरज ने अपनी दस्तक दी। घर के सब छोटे बड़े उठ गए सिवाय छोटी बेटी के। आज ठंड कुछ ज़्यादा थी इसलिए बार-बार उठाने के बाद भी वह उठने का नाम न लेती थी। अचानक वह स्वयं ही उठ खड़ी हुई, और तेजी से भागते हुए रसोई की ओर गई।‌माँ उसकी यह हरकत देख कुछ शंकित हुई, पर फिर जाने दिया। वह रोटी लेकर अपने साथ रसोई से बाहर लौटी। जब उसने बाहर के किवाड़ खोले तो देखा कि बाहर रात में वह कुछ-कुछ पंजों से खोद गया है, शायद अपने बैठने के लिए जगह बनाई हो। वह वहाँ से हटकर जल्दी से उसे ढूँढ़ने हुए आगे बढ़ गई। वहाँ रात की आतिशबाजियों से निकला बारूद व कूड़ा करकट जहाँ तहाँ बिखरा पड़ा था। कुछेक जगहों पर राख के दो-चार ढेर भी नज़र आए। उन्हीं में से एक ढेर पर वह दिख गया। उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। वह रोटी लिए उसकी ओर बढ़ गई। वह गहरी नींद में सो रहा था। बच्ची ने उसे उठाना उचित न समझा और प्यार से थपकी मारकर उसके पास रोटियाँ रखीं और वापस चल दी।उस दिन वह बहुत देर तक सोता रहा, पूरे दिन सोता रहा। शाम को एक दूसरा कुत्ता आया और उसके पास रखी रोटियाँ खाकर चला गया। पर वह सोता रहा, फिर कभी नहीं उठा।

अंकुश कुमार

#हिन्दीनामा_तरंग

अंकुश कुमार
अंकुश कुमार
अंकुश कुमार हिन्दी साहित्य के प्रति आज के युग में सकारात्मक कार्य करने वाले युवाओं में से एक हैं , इन्होने अपने हिंदी प्रेम को केवल लेखन तक सिमित न करते हुए एक नए प्रयाश के रूप में हिन्दीनामा की शुरुआत की।

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