छठ

ग्राम गीतों के बीच घर से गांव के पोखर तक की यात्रा केवल एक यात्रा भर नहीं होती, वरन यह सदियों से चली आ रही हमारी परम्पराएं हैं जो हमें इस दौड़ती-भागती भौतिकवादी दुनिया में यांत्रिक हो जाने से बचाती हैं।हम ग्रामीणों के भाग्य में तमाम मुश्किलों, कठिनाइयों, अभावों के मध्य ये ही तो कुछेक पल आते हैं जब लोग सब कुछ भूल कर आह्लादित होते हैं, उत्साहित होते हैं, खुशियां मनाते हैं।खेती-किसानी, बाढ़-सूखा, कर्ज-ब्याह, छप्पर-घर-परिवार की समस्याओं से लदे झुके लोग घाट तक पहुंचने के क्रम में मुस्कुराते हुए एक दूसरे का हाल चाल लेते हैं, एक दूसरे की खाँचियों(टोकरियों) के वजन को उठाने-उतारने में मदद करते वक़्त मानो भीतर भीतर ही एक दूसरे को दिलासा दे रहे होते हैं कि सामूहिकता के इसी भाव के सहारे वो सब मिलकर तमाम परेशानियों का हल भी निकाल लेंगे।छठ के पहले दिन का अर्घ्य डूबते हुए सूरज को दिया जाता है जो अपने आप में दुनिया की उस रीत से बिल्कुल अलग है जहाँ उन्हीं की पूछ होती है जिनके सितारे बुलंदी पर हों! छठ के महापर्व का यह डूबता हुआ सूरज सबको आने वाले उज्ज्वल और सुखमय कल के लिए आशावान करता है। यह उनकी निराशा को ख़त्म कर उन्हें आशा देता है कि अंधकार का वक़्त बीतने को है, आने वाला वक़्त रौशनी से भरपूर होगा।छठ के लिए सूप-डाली से लेकर फल-फूल के जुहान-जुटान तक में समाज का प्रत्येक तबका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इसमें सम्मिलित होता है। छठ सही मायनों में लोक का त्योहार है, घाट पर पहुंचने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल लोक है, उसमें कोई वर्गीय विभेद नहीं है। अमीर हो, गरीब हो सबके सूप-डाली में वही प्रसाद होना है, सबके लिए वही ईख होनी है और सबको घाट तक पैदल पहुंचना है। धोती-कुर्ता से लेकर जीन्स-कुर्ता वाले सभी कन्धों पर ईख और सर पर फलों की टोकरी लिए घाट की तरफ बढ़ रहे हैं।रामदरस पांडे के बेदी के बगल में ही सुखीराम की भी बेदी है जहां ‘सुखिया बो’ पियरी साड़ी पहन रामदरस बो के साथ अर्घ्य दे रही हैं और ‘रामदरस बो’ गाय का दूध लाना भूल गई हैं और अपने पति पर आँखें तरेर रही हैं। ‘सुखिया बो’ ने अपने दूध में से आधा दूध ‘रामदरस बो’ के लोटे में उड़ेल दिया है और दोनों मुस्कुराते हुए गीत गा रही हैं।वो औरतें जो कभी घरों से नहीं निकलती हैं, जिन्हें घरों से निकलने का मौका नहीं मिलता उन्हें भी आज के दिन अपनी दयादिन-भवद्दीनों से मिलने, उनका हाल चाल जानने का मौका मिलता है। तमाम भूले बिसरे चेहरे आज के दिन दिखते हैं।युवाओं खासकर वो जो अभी अभी बचपन से जवानी की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं, उनके लिए छठ का अलग महत्व है। छठ की तैयारी में ईख लाना, फल लाना, गाय के दूध आदि का इंतज़ाम सामान्यतः इन्हीं के कंधों पर होता है जो यह बखूबी निभाते हैं।लेकिन आज के दिन इससे भी बड़ी एक ज़िम्मेदारी इनके ऊपर होती है और वो यह है कि जिस चेहरे को पहली बार ही देखते हुए इन्हें अपने कलेजे के भीतर कुछ अजीब सा महसूस हुआ था, वह चेहरा भी आज वहां होगा। उसकी ‘नज़रों में आने और छा जाने’ की भारी भरकम ज़िम्मेदारी। जिसके लिए ये जी जान से मेहनत करते हैं और सर पर टोकरी और उसमें ठीक ठाक वजन लेकर किलो दो किलो मीटर चलते हुए भले इनकी आत्मा रो रही होती है लेकिन मजाल है कि वो भाव इनके चेहरे पर आ जाए। सामान्य दिन हो तो इतना वजन उठाने के बाद ये वहीं गश खाकर गिर पड़ें लेकिन आज, आज तो कुछ और ही बात होती है; आज ये मीरा बाई चानू हैं।वर्ष भर काम-धंधे की तलाश में शहर शहर ठोकर खाते लोग जिनका कोई चेहरा नहीं होता, जो बाकियों के लिए कोई वजूद नहीं रखते, जो केवल भीड़ की शक्ल में होते हैं, वो लोग इन दिनों अपने घर वापस लौटते हैं। अपने गांव वापस आते हैं, जहां उनका एक अस्तित्व है, जहां वो ‘ए इधर आओ’ नहीं हैं बल्कि रमेश, सुरेश मनोज और गुड्डू हैं। साल भर खून पसीना एक कर कमाए हुए पैसे लेकर लौटते ये लोग हाट बाजारों को रौनक से भर देते हैं। नई ब्याही दुल्हन के लिए टिकुली-बिछिया-पायल-चूड़ी, माँ के लिए चमकदार साड़ी और बाप के लिए झक सफेद कुर्ता खरीदते इन्हीं लोगों ने देश को देश बनाये रखा है, इन्होंने ही त्योहारों की रौनक बचाये रखी है और इन सीधे सादे लोगों ने ही रिश्तों में गर्मजोशी, निश्छलता और प्रेम बचाये रखा है।आज जब तमाम त्योहार कृत्रिमता के आवरण के बोझ में दबे जा रहे हैं, बनावटीपन और दिखावा त्योहारों का अभिन्न अंग बन गया है तब छठ हमें सहजता, प्रकृति और लोक की तरफ लौटने का रास्ता दिखाता है।छठ पूजा की बात की जाए तो यह पारंपरिक रूप में लड़कों से सबंधित त्योहार माना जाता है जो आधुनिक प्रतिमानों पर इसकी एक सीमा है। लेकिन सुखद यह है कि बदलते वक्त के साथ लोग बदल रहे हैं और अब सीमित मात्रा में ही सही लेकिन लड़कियों की सहभागिता भी देखने को मिल रही है जो निश्चित रूप से एक अच्छा संदेश है और यह सकारात्मक बदलाव आने वाले वक्त में छठ को सही मायनों में लोक का त्योहार होने गौरव प्रदान करेगा।तो आइए हम सब मिलकर आस्था के इस महासंगम में डुबकी लगाएं और सबकी उन्नति की कामना करें।’काँच ही बांस के बहंगिया बहँगी लचकत जायेपहनी ना महादेव जी पियरिया दउरा घाटे पहुचाये,गउरा में सजल बाटे हर फर फलहरियापियरे पियरे रंग शोभेला डगरियाजेकर जाग जाला भगिया उहे छठी घाट आयेपहनी ना महादेव जी पियरिया दउरा घाटे पहुचाये।छठी माई चहिए ना कोनो कमीघरवा में भरल रहे अन धन लक्ष्मी…’छठ पूजा की बधाई।

एकलव्य राय

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