जग वाली चाय

मई में तीन साल की हो गयी। बाल मनोविज्ञान में विद्वान बताते हैं कि बच्चों के द्वारा चीज़ों को भली-भाँति पकड़कर उठा लेने की भी निश्चित समयावधि होती है। गिलास में चाय है, चाय भी गरमागरम है। यही नहीं गिलास में तो हैण्डल भी नहीं होता। अब रुचि गिलास में रखी चाय कैसे अपने दादा तक पहुँचाए। घर में मम्मी हैं, दादाजी हैं और हाँ रुचि तो घर के हर कोने में है।

गाँव में लोगों के स्वागत-सत्कार के तरीके में खिलाने-पिलाने का अच्छा रिवाज है। ज़्यादातर चाय ही बनती है और ज़्यादा की ज़रूरत भी नहीं पड़ती क्योंकि रुचि के दादाजी से लोग ज़्यादातर सूर्योदय के तुरंत बाद मिलने आते हैं। कुछ खाने को दो तो कहते हैं दातुन ही नहीं किया है। चाय पीने के लिए दातुन की क्या ज़रूरत। आदमी भी ना, निकाल ही लेता है बाईपास! जैसे व्रत में नमकीन स्वाद के लिए सेंधा नमक चल जाता है।

हाँ तो कोई आए, दादाजी रुचि को कहते हैं चाय बनवाओ मम्मी से। रुचि की मम्मी पूछती हैं कि कितने लोग हैं तो फिर से वो कहती है बाबा, चाय। क्या ही करें मम्मी, आवाज़ों को सुनने का प्रयास करती हैं और अनुमान से चाय बनाती हैं। कैसे निकलें मम्मी, बाहर सब ससुर जी लोग ही बैठे हैं तो जिम्मेदारी रुचि पर आ धमकती है। रुचि गिलास पकड़ेगी तो चाय तो धरती को पीना पड़ेगा। तब रुचि की माँ को जग में गिलास रखकर चाय भिजवाने का आइडिया आया और लो जी हो गई जग वाली चाय।

रुचि जितने लोग रहते हैं उतने बार में चाय ले जाती है, और मजे की बात है कि उसे इस हर दिनी यात्रा में दिक्कत नहीं है। बात बस इतनी है बचपन में जो कूद-कूदकर काम करते हैं , पूरे मन से काम करते हैं वो बड़े रहने पर भी कायम रहे तो ना बी.पी. हिलेगा, ना नींद का संसार उजड़ेगा। जग में गिलास, गिलास में चाय, चाय है गरम, रुचि आराम से उठाए। रुचि जब चाय लेकर आती है तो मौसी की पहनाई उसकी छोटी पायल झुनझुन आवाज करती है। दादाजी के साथीजन जिनके नाती-नतिनी बड़े हो गए वो कहते हैं बच्चे छुटपन में ही प्यारे होते हैं।

तीन साल बाद रुचि अब थोड़ी बड़ी हो गई है, चाय की गिलास पकड़ना अच्छे से जान गई है। दादाजी उसे अपने साथ बाजार ले जाते हैं और वह भी बताती है कौन सा टमाटर बढ़िया पका है। उसे नींबू की खटास बहुत प्रिय है, ललच जाती है नींबू देखते ही। नींबू के भाव कोरोना में जब विटामिन सी की चिंता बढ़ती है तो बढ़ते हैं और फिर गर्मी में तो हमेशा ही बढ़ जाते हैं। गाँव की सुबही जुटान जब कभी रद्द हो जाती तो तिजहरिया यानी तीसरे पहर जुटती है। गर्मी में चाय बस सुबह ही पी जाती है वो भी एकदम सुबह वरना शर्बत/छाछ/लस्सी की बहार रहती है। तीन लोग रुचि के दादाजी से मिलने आए हैं और दादाजी नें लस्सी की माँग की है। रुचि बहुत ध्यान से माँ को दही मथते देखती है फिर उसमें चीनीचूर्ण, गुलाब जल मिलाते देखती है। जग उसका प्रिय बर्तन है। लस्सी तो जग में ही दी जाती है पर साथ में गिलास रख लेती है। ख़ुद पीने को लस्सी माँगा तो माँ ने कहा पहले दे आ। यही तो बेकार बात लगती है रुचि को। कहती है अगर कुछ अच्छा बना है तो उसपर पहले बच्चे का हक है कि बाबा का। ख़ैर अपनी गिलास के बारे सोचते जल्दी-जल्दी देने के लिए भागती है जग में लस्सी लेकर पर तेजी और जग पकड़ने में असावधानी ने रुकावट डाल दी। बाहर के दरवाज़े के ठीक पहले जग टेढ़ा हुआ और भारी मात्रा में लस्सी नीचे। दादा जी क्या बोलें, रुचि के आँसू निकल आए कि अब बची हुई मेरी लस्सी ही इधर बँटेगी और दादाजी तनाव कम करने को हँसकर कुछ नहीं हुआ कुछ नहीं हुआ कर रहे हैं। दादाजी से मिलने आए लोगों के मन गिरी लस्सी की गुणवत्ता देख मसोस रहे हैं, पर कर भी क्या सकते हैं। रुचि की मम्मी रुचि के ऊपर अपने भारी विश्वास की ग़लती पर माथा सहला रही हैं और पुनः नींबू-पानी बनाने की दादाजी की बात को अमल ला रही हैं। दादाजी कहते हैं रुचि तुम वैसे ही लस्सी लाया करो जैसे जग में चाय लाती थी। रुचि हाँ में सिर हिलाकर हँसने लगती है।

कोशलेन्द्र मिश्र

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