महावीर प्रसाद द्विवेदी

0 लेख
आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी हिन्दी के महान साहित्यकार, पत्रकार एवं युगप्रवर्तक थे। उनका जन्‍म सन् 1864 ई्. में जिला रायबेरली के दौलतपुर नामक ग्राम में हुआ था। उन्होंने हिंदी साहित्य की अविस्मरणीय सेवा की और अपने युग की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना को दिशा और दृष्टि प्रदान की। उनके इस अतुलनीय योगदान के कारण आधुनिक हिंदी साहित्य का दूसरा युग 'द्विवेदी युग' (1900–1920) के नाम से जाना जाता है। उन्होने सत्रह वर्ष तक हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका सरस्वती का सम्पादन किया। हिन्दी नवजागरण में उनकी महान भूमिका रही। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन को गति व दिशा देने में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। हिंदी भाषा के प्रसार, पाठकों के रुचि परिष्कार और ज्ञानवर्धन के लिए द्विवेदी जी ने विविध विषयों पर अनेक निबंध लिखे। विषय की दृष्टि से द्विवेदी जी निबंध आठ भागों में विभाजित किए जा सकते हैं - साहित्य, जीवन चरित्र, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, उद्योग, शिल्प भाषा, अध्यात्म। द्विवेदी जी ने आलोचनात्मक निबंधों की भी रचना की। उन्होंने आलोचना के क्षेत्र में संस्कृत टीकाकारों की भांति कृतियों का गुण-दोष विवेचन किया और खंडन-मंडन की शास्त्रार्थ पद्धति को अपनाया है। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- काव्य संग्रह: काव्य-मन्जूषा। आलोचना— नाट्यशास्त्र, हिन्दी-नवरत्न, रसज्ञ-रंजन, साहित्य-सीकर, विचार-विमर्श, साहित्य- सन्दर्भ, कालिदास एवं उनकी कविता, कालिदास की निरंकुशता, नैषधचरित चर्चा। अनुदित— मेघदूत, बेकन – विचारमाला, शिक्षा, स्वाधीनता, विचार – रत्नावली, कुमासम्भव, गंगालहरी, विनय – विनोद, रघुवंश, किरातार्जुनीय, हिन्दी महाभारत सम्पादन— ‘सरस्वती’ मासिक पत्रिका | कुछ अन्य रचनाएं- हिन्दी भाषा की उत्पत्ति, सम्पत्तिशास्त्र, अद्भुत आलाप, संकलन, अतीत – स्मृति, वाग्विलास, जल – चिकित्सा, वक्तृत्व – कला। सन् 1931 ई० काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने आचार्य की उपाधि से तथा हिन्दी – साहित्य सम्मलेन ने साहित्य – वाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किया। हिंदी साहित्य के इतिहास में सन् 1900 ई० से 1920 ई० तक के समय को द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है।

रचनाएँ

No posts to display

प्रचलित लेखक

आपकी रचना