अलका सरावगी का जन्म 17 नवम्बर1960 को कोलकाता में हुआ था। अलका सरावगी आधुनिक युग की एक सजग कथाकार रहीं हैं और इस कारण उन्होंने अपने समय के यथार्थ के उपर्युक्त पहलू को अपनी कथा साहित्य में प्रस्तुत किया है I अलका सरावगी ने अपने समग्र उपन्यासों में सामाजिक जीवन और परिवर्तनशील मानव मूल्यों की गाथा को समाहित किया है। अपने उपन्यासों में समसामायिक यथार्थ को चित्रित करते हुुए, मध्यमवर्गीय समाज की समस्याओं के साथ-साथ रूढ़िगत परम्पराओं के विद्यटन को स्वर दिया है। उनके कलिकथाः वाया बाइपास से लेकर जानकीदास, तेजपाल मेन्शन तक के उपन्यासों में सामाजिक जीवन की झलक मिलती है। स्वतंत्रता के पूर्व के सामाजिक जीवन एवं उसकी दशाओं को दर्शाया है तो वही स्वतंत्र्योतर सामाजिक चेतना के साथ आज के समकालीन समाज की विडम्बनाओं को व्यापक रूप में अभिव्यक्त किया है।
उनकी प्रमुख रचनाएं हैं-
कलिकथा वाया बाइपास (उपन्यास), शेष कादम्बरी (उपन्यास), कोई बात नहीं (उपन्यास), एक ब्रेक के बाद (उपन्यास), कहानी की तलाश में (कहानी-संग्रह), दूसरी कहानी (कहानी-संग्रह)।
उन्हें श्रीकांत वर्मा पुरस्कार (1998), साहित्य अकादमी पुरस्कार (2001) तथा बिहारी पुरस्कार (2006) से सम्मानित किया गया।