द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी का जन्म 1 दिसंबर 1916 को रौहता गांव, ज़िला आगरा में हुआ था। उन्होंने बाल साहित्य पर 26 पुस्तकें लिखीं जिससे वे 'बच्चों के गांधी' भी कहलाते हैं। उनकी कविताएं आज भी बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल हैं। हर रचना से बाल मन आज भी प्रेरित होता है। उनकी अधिकांश रचनाएं देश प्रेम, वीरता, प्रकृति आदि पर आधारित हैं। बच्चों के कवि सम्मेलन का प्रारम्भ और प्रवर्तन करने वालों के रूप में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का योगदान अविस्मरणीय है। वह उत्तर प्रदेश के शिक्षा सचिव थे। उनकी अध्यक्षता में 500 बाल कविताओं की रचना हुई थी। हिंदी की इन कविताओं को स्कूलों में पढ़वाना व अंग्रेजी की कविताओं की जगह स्थापित करना इसका उद्देश्य था। इलाहाबाद में ही माहेश्वरी जी ने 'गुंजन' नामक संस्था भी बनाई, जिसकी गोष्ठियाँ हिंदी साहित्य सम्मेलन के कक्ष में समय-समय पर होती रहती थीं। माहेश्वरी जी भी काव्यमंचों पर कवितापाठ भी करते थे तथा उन्होंने श्रोताओं से भूरि भूरि सराहना पाई।
माहेश्वरी जी की कोई 40 से ज्यादा बाल पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें बालगीत, बाल कथागीत, गीत, कविताओं व संस्मरण आदि की पुस्तकें हैं। साक्षरता से जुड़ी भी उनकी कई पुस्तकें हैं जिन्होंने साक्षरता के प्रसार में अहम भूमिका निभाई है।
साहित्यिक अवदान के लिए माहेश्वरी जी को अनेक पुरस्कार मिले। वर्ष 1977 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा उन्हें बाल साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार प्रदान किया गया। यह पुरस्कार तथा ताम्रपत्र उन्होंने तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई से ग्रहण किया। 1992 में उन्हें पुनः उ.प्र. हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा बाल साहित्य के क्षेत्र में सर्वोच्च पुरस्कार बाल साहित्य भारती से सम्मानित किया गया।