गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'

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गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' का जन्म 21 अगस्त, 1883 ई. को उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले के हडहा ग्राम में हुआ। सनेहीजी ब्रजभाषा के अतिरिक्त हिन्दी में भी एक बड़े ही भावुक और सरसहृदय कवि थे। ये पुरानी और नई दोनों चाल की कविताएँ लिखते थे। प्रेम और शृंगार की कविताओं में इनका उपनाम 'सनेही और पौराणिक तथा सामाजिक विषयों वाली कविताओं में 'त्रिशूल है। इनकी उर्दू कविता भी बहुत ही अच्छी होती थीं। इनकी पुरानी ढंग की कविताएँ 'रसिकमित्र', 'काव्यसुधानिधि' और 'साहित्यसरोवर' आदि में बराबर निकलती रहीं। कालान्तर में इनकी प्रवृत्ति खड़ी बोली की ओर हुई। इस मैदान में भी इन्होंने अच्छी सफलता पाई। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- प्रेम पचीसी, गप्पाष्टक, कुसुमांजलि, कृषक-क्रन्दन, त्रिशूल तरंग, राष्ट्रीय मंत्र, संजीवनी, राष्ट्रीय वीणा, कलामे-त्रिशूल, करुणा कादंबिनी। देश के अनेक साहित्यिक संस्थाओं ने समय-समय पर सनेही जी का सम्मान एवं अभिनंदन किया। युवावस्था में ही उन्हें भारत धर्म महामंडल, काशी ने 'साहित्य-सितारेन्दु' की उपाधि प्रदान की थी। 1966 ई० में उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ने उन्हें 'साहित्य-वारिधि' की उपाधि प्रदान की। 1968 ई० में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने उन्हें 'साहित्य-वाचस्पति' की उपाधि प्रदान की थी। सन 1970 ई० में कानपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी०लिट्० की मानद उपाधि से विभूषित किया था। इसके अतिरिक्त अनेक सांस्कृतिक संस्थाओं तथा पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा उन्हें 'राष्ट्रीय महाकवि', 'सुकवि-सम्राट', 'आचार्य' आदि अनेक उपाधियों से अलंकृत किया गया था।

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