कुंअर बेचैन का जन्म 1 जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के उमरी गांव में हुआ था। कुँअर बेचैन ग़ज़ल लिखने वालों में ताज़े और सजग रचनाकारों में से हैं। उन्होंने आधुनिक ग़ज़ल को समकालीन जामा पहनाते हुए आम आदमी के दैनिक जीवन से जोड़ा है। यही कारण है कि वे नीरज के बाद मंच पर सराहे जाने वाले कवियों में अग्रगण्य हैं। उन्होंने गीतों में भी इसी परंपरा को कायम रखा है। वे न केवल पढ़े और सुने जाते हैं वरन कैसेटों की दुनिया में भी खूब लोकप्रिय हैं। सात गीत संग्रह, बारह ग़ज़ल संग्रह, दो कविता संग्रह, एक महाकाव्य तथा एक उपन्यास के रचयिता कुँवर बेचैन ने ग़ज़ल का व्याकरण नामक ग़ज़ल की संरचना समझाने वाली एक अति महत्वपूर्ण पुस्तक भी लिखी है।
उन्होंने लगभग पैंतीस से अधिक कृतियां रचीं, जिनमें गीत, ग़ज़ल, कविता, महाकाव्य़, हाइकू, उपन्यास व समालोचना विधा शामिल हैं। 9 गीत संग्रह, 15 ग़ज़ल संग्रह, एक महाकाव्य़, एक हाइकू, एक दोहा संग्रह, दो उपन्यास, एक यात्रा वृत्तांत व कुछ अन्य कृतियां शामिल हैं, जिनकी सूची निम्नांकित है- पिन बहुत सारे (1972), भीतर साँकल: बाहर साँकल (1978), शामियाने काँच के (1983), महावर इंतज़ारों का (1983), रस्सियाँ पानी की (1987), उर्वशी हो तुम (1987), झुलसो मत मोरपंख (1990), पत्थर की बाँसुरी (1990), दीवारों पर दस्तक (1991), नाव बनता हुआ काग़ज़ (1991), आग पर कंदील (1993), एक दीप चौमुखी (1997), आँधियों में पेड़ (1997), आठ सुरों की बाँसुरी (1997), आँगन की अलगनी (1997), नदी तुम रुक क्यों गई (1997), शब्द: एक लालटेन (1997), तो सुबह हो (2000), कोई आवाज़ देता है (2005), नदी पसीने की (2005), दिन दिवंगत हुए (2005), डॉ कुंवर बैचेन के नवगीत, पांचाली (महाकाव्य)।
हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्याणमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं।