लीलाधर जगूड़ी का जन्म 01 जुलाई 1940 धंगण गाँव, टिहरी जिला, उत्तराखंड में हुआ था। ऐसे कवि हैं जिन्होंने भाव और भाषा के साथ कविता को बेहद संजीदगी से पाला और पोषा है। स्वयं जगूड़ी कहते हैं कि 'भाषाएं भी अलग-अलग रौनकों वाले पेड़ों की तरह हैं। सबका अपना अपना हरापन है, कुछ उन्हें काट कर उनकी छवियों का एक ही जगह बुरादा बना देते हैं।' काव्य को नया रूप देने में वह हमेशा सक्रिय रहते हैं। वह भावों में नूतनता प्रकट करते हैं। शब्दों और भाषा को तोड़ मरोड़ कर कविता को नया करना उनका शगल नहीं है। वह भाषा को रचते हैं, गढ़ते हैं। उसमें अपना अनुभव पिरोते हैं। अपने समकक्ष कवियों में भाषा का नवीन प्रयोग शायद लीलाधर जगूड़ी ने ही किया है। वह कविता करते वक्त भावुक जरा भी नहीं होते हैं। बल्कि देश, काल, समय और वातावरण को यथार्थ मानकर कविता रचते हैं। उनकी कविताओं में एक निरंतरता बने रहती है। समय को परिभाषित करते हुए वह आगे बढ़ते है। उनके अंदर प्रकृति, सौंदर्य, प्रेम और मौसम को समझने का एक गहरा बोध दिखाई देता है लेकिन वह यही थम कर नहीं रह जाते बल्कि भावों को यथार्थ की कसौटी पर भी कसते हैं।
उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- कविता संग्रह: शंखमुखी शिखरों पर, नाटक जारी है, इस यात्रा में, रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, भय भी शक्ति देता है, अनुभव के आकाश में चाँद, महाकाव्य के बिना, ईश्वर की अध्यक्षता में, खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है
नाटक: पाँच बेटे
गद्य: मेरे साक्षात्कार।
उन्हें पद्मश्री सम्मान, रघुवीर सहाय सम्मान, भारतीय भाषा परिषद् शतदल सम्मान, नमित पुरस्कार, आकाशवाणी पुरस्कार, व्यास सम्मान तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।