निर्मल वर्मा

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निर्मल वर्मा का जन्म 3 अप्रैल 1929 को शिमला में हुआ था। वह हिन्दी के आधुनिक कथाकारों में एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार थे। अपनी गंभीर, भावपूर्ण और अवसाद से भरी कहानियों के लिए जाने-जाने वाले निर्मल वर्मा को आधुनिक हिंदी कहानी के सबसे प्रतिष्ठित नामों में गिना जाता रहा है, उनके लेखन की शैली सबसे अलग और पूरी तरह निजी थी। परिंदे से प्रसिद्धि पाने वाले निर्मल वर्मा की कहानियां अभिव्यक्ति और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ समझी जाती हैं। ब्रिटिश भारत सरकार के रक्षा विभाग में एक उच्च पदाधिकारी श्री नंद कुमार वर्मा के घर जन्म लेने वाले आठ भाई बहनों में से पांचवें निर्मल वर्मा की संवेदनात्मक बुनावट पर हिमांचल की पहाड़ी छायाएं दूर तक पहचानी जा सकती हैं। उन्होंने कहानी की प्रचलित कला में तो संशोधन किया ही, प्रत्यक्ष यथार्थ को भेदकर उसके भीतर पहुंचने का भी प्रयत्न किया है। हिन्दी के महान साहित्यकारों में से अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे कुछ ही साहित्यकार ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर भारतीय और पश्चिम की संस्कृतियों के अंतर्द्वन्द्व पर गहनता एवं व्यापकता से विचार किया है। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- उपन्यास- वे दिन, एक चिथड़ा सुख, लाल टीन की छत, रात का रिपोर्टर, अंतिम अरण्य। कहानी संग्रह- परिंदे, जलती झड़ी, पिछली गर्मियों में, कव्वे और काला पानी, सूखा और अन्य कहानियां। निबन्ध- चीड़ों पर चाँदनी, हर बारिश में, शब्द और स्मृति, कला का जोखिम , ढलान से उतरते हुए, भारत एयर यूरोप प्रतिश्रुति के क्षेत्र में, शताब्दी के ढलते वर्षों में, दूसरे शब्दों में, आदि अंत और आरम्भ। निर्मल वर्मा को 1985 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, फिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।। उन्हें सन 2002 में भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। अपने निधन के समय निर्मल वर्मा भारत सरकार द्वारा औपचारिक रूप से नोबेल पुरस्कार के लिए नामित थे।

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परिन्दे

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