पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी

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डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 27 मई 1894 को खैरागढ़ में हुआ था। उन्हें ‘मास्टरजी’ के नाम से भी जाना जाता है, हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार थे। अध्ययन, अध्यापन, लेखन, संपादन व सर्वोपरि शिक्षकीय कार्य पर गर्व करने वाले साहित्य साधक बख्शी जी की अभिलाषा यही रही कि अगले जन्म में भी मास्टर बनूं । बख्शी जी ने राजनांदगांव के स्टेट स्कूल, कांकेर हाई स्कूल, खैरागढ़ के हाई स्कूल में शिक्षक के रूप में अपनी सारस्वत सेवाएं दी । दिग्विजय महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक रहे । इस बीच उनका सृजन कर्म निरंतर प्रशस्त्र होता रहा । साहित्य चर्चा, कुछ, और कुछ, यात्री, मेरे प्रिय निबंध, मेरा देश, तुम्हारे लिए आदि निबंध संग्रह, विश्व साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श आदि समीक्षात्मक कृतियाँ, झलमला , त्रिवेणी आदि कहानी संग्रह के अतिरिक्त उपन्यास, डायरी, आत्मकथा, संस्मरण, नाटक, बाल साहित्य व काव्य कृतियों के माध्यम से भी बख्शी जी ने सरस्वती के संपादक के रूप में अनुकरणीय व अविस्मरणीय सेवाएं प्रदान की। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- कविताएँ- अश्रुदल, शतदल, पंच-पात्र। नाटक- अन्नपूर्णा का मंदिर, उन्मुक्ति का बंधन। उपन्यास- कथा-चक्र, भोला (बाल उपन्यास), वे दिन (बाल उपन्यास)। समालोचना-निबन्ध- हिन्दी साहित्य विमर्श, विश्व-साहित्य, हिन्दी कहानी साहित्य, हिन्दी उपन्यास साहित्य, प्रदीप (प्राचीन तथा अर्वाचीन कविताओं का आलोचनात्मक अध्ययन), समस्या, समस्या और समाधान, पंचपात्र, पंचरात्र, नवरात्र, यदि मैं लिखता (कुछ प्रसिद्ध कृतियों पर कथात्मक विचार), हिन्दी-साहित्य : एक ऐतिहासिक समीक्षा, साहित्यिक-सांस्कृतिक निबंध, बिखरे पन्ने, मेरा देश। आत्मकथा-संस्मरण- मेरी अपनी कथा,जिन्हें नहीं भूलूंगा, अंतिम अध्याय (1972)। साहित्य-समग्र, बख्शी ग्रन्थावली (आठ खण्डों में)। उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा सन् 1949 में साहित्य वाचस्पति की उपाधि से अलंकृत किया गया। 1969 में सागर विश्वविद्यालय से द्वारिका प्रसाद मिश्र (मुख्यमंत्री) द्वारा डी-लिट् की उपाधि से विभूषित किया गया।

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