सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म 15 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में हुआ था। जब उन्होंने दिनमान का कार्यभार संभाला तब समकालीन पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को समझा और सामाजिक चेतना जगाने में अपना अनुकरणीय योगदान दिया। सर्वेश्वर मानते थे कि जिस देश के पास समृद्ध बाल साहित्य नहीं है, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं रह सकता। सर्वेश्वर की यह अग्रगामी सोच उन्हें एक बाल पत्रिका के सम्पादक के नाते प्रतिष्ठित और सम्मानित करती है। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- काव्य – तीसरा सप्तक – सं. अज्ञेय, काठ की घंटियां, बांस का पुल, एक सूनी नाव, गर्म हवाएं, कुआनो नदी, जंगल का दर्द, खूंटियों पर टंगे लोग, क्या कह कर पुकारूं, कविताएं (1), कविताएं (2), कोई मेरे साथ चले, मेघ आये, काला कोयल। कथा-साहित्य- पागल कुत्तों का मसीहा, सोया हुआ जल, उड़े हुए रंग, कच्ची सड़क, अंधेरे पर अंधेरा, अनेक कहानियों का भारतीय तथा यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद सोवियत कथा संग्रह 1978 में सात महत्वपूर्ण कहानियों का रूसी अनुवाद। नाटक- बकरी, लड़ाई, अब गरीबी हटाओ, कल भात आएगा तथा हवालात, रूपमती बाज बहादुर तथा होरी धूम मचोरी मंचन। यात्रा संस्मरण- कुछ रंग कुछ गंध। बाल कविता- बतूता का जूता, महंगू की टाई। बाल नाटक- भों-भों खों-खों, लाख की नाक। संपादन- शमशेर, रूपांबरा, अंधेरों का हिसाब, नेपाली कविताएं, रक्तबीज । उन्हें कविता संग्रह खूँटियों पर टँगे लोग के लिये 1983 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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