गीतों के राजकुमार कहे जाने वाले शैलेंद्र का जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी में हुआ था। इन्होंने राज कपूर के साथ बहुत काम किया। शैलेन्द्र हिन्दी फिल्मों के साथ-साथ भोजपुरी फिल्मों के भी एक प्रमुख गीतकार थे। कॉलेज के दिनों में ही, आज़ादी से पहले वे नवोदित कवि के तौर पर कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेने लगे थे। हंस, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाओं में उनकी कविताएं छपने लगी थीं। इस दौरान 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के वक़्त कॉलेज के साथियों के साथ वे जेल भी पहुंच गए थे। कविता और प्रगतिशील नज़रिए के चलते शैलेंद्र इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ गए। शैलेंद्र का उनके समकालीन कितना सम्मान करते थे, इसका एक उदाहरण 1963 में तब देखने को मिला जब साहिर लुधियानवी ने साल का फ़िल्म फेयर अवार्ड यह कह कर लेने से इनकार कर दिया था कि उनसे बेहतर गाना तो शैलेंद्र का लिखा बंदिनी का गीत - 'मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे' है।
उनके प्रमुख गीत हैं-
आवारा हूँ (श्री ४२०)
रमैया वस्तावैया (श्री ४२०)
मुड मुड के ना देख मुड मुड के (श्री ४२०)
मेरा जूता है जापानी (श्री ४२०)
आज फिर जीने की (गाईड)
गाता रहे मेरा दिल (गाईड)
पिया तोसे नैना लागे रे (गाईड)
क्या से क्या हो गया (गाईड)
हर दिल जो प्यार करेगा (संगम)
दोस्त दोस्त ना रहा (संगम)
सब कुछ सीखा हमने (अनाडी)
किसी की मुस्कराहटों पे (अनाडी
सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है (तीसरी कसम)
दुनिया बनाने वाले (तीसरी कसम)
उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था।ज़्यादा शराब पीने के कारण लिवर सिरोसिस से शैलेंद्र का निधन 14 दिसंबर, 1966 को हुआ था। महज़ 43 साल की उम्र में वो इस दुनिया को छोड़ गए।