श्रीकांत वर्मा का जन्म 18 सितम्बर 1931 को बिलासपुर छत्तीसगढ़ में हुआ। वह गीतकार, कथाकार तथा समीक्षक के रूप में जाने जाते हैं। राजनीति से भी जुडे थे तथा राज्यसभा के सदस्य रहे। श्रीकांत वर्मा मुक्तिबोध की पीढ़ी के बाद के कवियों में अन्यतम बेचैन कवि इस माने में ज्यादा हैं कि उन्होंने अपनी कविता के जरिए न केवल अपने समय का सीधा, तीक्ष्ण और अन्दर तक तिलमिला देने वाला भयावह साक्षात्कार किया बल्कि हर अमानवीय ताकत के विरुद्ध एक निर्मम और नंगी भिड़ंत की। इसीलिए उनकी कविता में नाराज़गी, असहमति और विरोध का स्वर सबसे मुखर है। उनकी कविता उस दर्पण की तरह है, जहाँ कोई झूठ छिप नहीं सकता। उनकी कविता हर झूठ के विरुद्ध कहीं प्रतिशोध है तो कहीं सार्थक वक्तव्य। शायद इसीलिए वे सन् 60 के बाद की कविता के हिन्दी के पहले नाराज़ कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। भटका मेघ से शुरू हुई श्रीकांत वर्मा की काव्य–यात्रा माया दर्पण, दिनारंभ और जलसाघर से गुज़रते हुए एक ऐसी कवि की दुनिया है जहाँ बीसवीं शताब्दी के मनुष्य की अपने समय से सीधी बहस है।
उनकी प्रमुख रचनाएं हैं-
काव्य-
भटका मेघ, माया दर्पण, दिनारम्भ, जलसाघर, मगध, गरुड़ किसने देखा है
कहानी संग्रह-
झाड़ी, संवाद, घर, ठंड, बास, साथ
उपन्यास-
दूसरी बार, अश्वत्थ, ब्यूक
आलोचना-
जिरह
यात्रा वृत्तान्त-
अपोलो का रथ
साक्षात्कार-
बीसवीं शताब्दी के अंधेरे मे
कविता संकलन का कार्य-
मुक्तिबोध के काव्य संग्रह 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' की कविताओं का संकलन
श्रीकांत वर्मा को 1973 में मध्यप्रदेश सरकार का 'तुलसी सम्मान'; 1984 में 'आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी पुरस्कार'; 1981 में 'शिखर सम्मान'; 1984 में कविता और राष्ट्रीय एकता के लिए केरल सरकार का 'कुमारन् आशान' राष्ट्रीय पुरस्कार; 1987 में 'मगध' नामक कविता संग्रह के लिये मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किए गए।