प्रकृति के चतुर चितेरे एवं कोमल कल्पना के कौशेय कवि सुमित्रानन्दन पन्त छायावाद के प्रतिनिधि कवि हैं। छायावादी कवि-चतुष्टयी में पन्त जी का प्रमुख स्थान है उनका जन्म 20 मई 1900 को कौसानी में हुआ था। सन् 1921 ई० में महात्मा गाँधी के आह्वान पर कॉलेज छोड़ दिया। सन् 1921 में गाँधी और गाँधी-विचार-दर्शन ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वे पढ़ाई छोड़कर असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित हो गये। किन्तु अपने कोमल स्वभाव के कारण सत्याग्रह में सम्मिलित न रह सके और पुनः साहित्य-साधना में संलग्न हो गये। श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी के काव्य में कल्पना एवं भावों की सुकुमार कोमलता के दर्शन होते हैं। इन्होंने प्रकृति एवं मानवीय भावों के चित्रण में विकृत तथा कठोर भावों को स्थान नहीं दिया है। इनकी छायावादी कविताएँ अत्यन्त कोमल एवं मृदुल भावों को अभिव्यक्ति करती हैं। इन्हीं कारणों से पन्त जी को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है।
उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- वीणा, उच्छावास, पल्लव, मधु ज्वाला, मानसी, वाणी, युग पथ, सत्यकाम, ग्रंथी, गुंजन, लोकायतन,स्वर्णधूलि, स्वर्ण-किरण, युगपथ, उत्तरा, अतिमा, युगान्त, युगवाणी और ग्राम्या आदि।
हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968), साहित्य अकादमी, तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया।