छायावाद के प्रमुख कवियों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी जी का जन्म सन् 1896 ई में हुआ था। निश्चित तिथि के अभाव में इनका जन्मदिवस माघ मास में वसन्त पंचमी के दिन मनाया जाता है। उन्होंने कई कहानियाँ, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है। अपने समकालीन अन्य कवियों से अलग उन्होंने कविता में कल्पना का सहारा बहुत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है। वे हिन्दी में मुक्तछन्द के प्रवर्तक भी माने जाते हैं।
उनकी प्रमुख रचनाएं हैं-
काव्य संग्रह- अनामिका, परिमल, गीतिका, द्वितीय अनामिका, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना, आराधना , गीत कुंज, सांध्य काकली, अपरा, दो शरण, रागविराग ।
लम्बी रचनाएँ- राम की शक्ति पूजा, सरोज स्मृति, बादल राग, तुलसीदास।
उपन्यास- अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा , कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा, चोटी की पकड़, काले कारनामे , चमेली, इन्दुलेखा।
15 अक्तूबर 1961 को इलाहाबाद में उनका निधन हुआ।