वृंदावनलाल वर्मा

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वृंदावनलाल वर्मा का जन्म 9 जनवरी 1889, मऊरानीपुर, झाँसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। हिन्दी उपन्यास के विकास में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने एक तरफ प्रेमचंद की सामाजिक परंपरा को आगे बढ़ाया है तो दूसरी तरफ हिन्दी में ऐतिहासिक उपन्यास की धारा को उत्कर्ष तक पहुँचाया है। ऐतिहासिक उपन्यासों के कारण वर्माजी को सर्वाधिक ख्याति प्राप्त हुई। उन्होंने अपने उपन्यासों में इस तथ्य को झुठला दिया कि ‘ऐतिहासिक उपन्यास में या तो इतिहास मर जाता है या उपन्यास’, बल्कि उन्होंने इतिहास और उपन्यास दोनों को एक नई दृष्टि प्रदान की। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं- उपन्यास :- मृगनयनी (1950 ई.), टूटे काँटे (1945 ई.), झाँसी की रानी (1946 ई.), गढ़ कुंडार (1930 ई.), महारानी दुर्गावती, अमरबेल (1953 ई.), कचनार (1947 ई.), माधवजी सिंधिया (1950 ई.), अचल मेरा कोई (1948 ई.), सोना (1952 ई.), मुसाहिबजू (1946 ई.), रामगढ़ की रानी (1950 ई.), सोती आग, डूबता शंखनाद, लगन, कुंडलीचक्र (1932 ई.), भुवनविक्रम (1957 ई.), ललितादित्य, अहिल्याबाई, उदय किरण, देवगढ़ की मुस्कान, कभी न कभी (1945 ई.), संगम (1928 ई.), प्रेम की भेट (1928 ई.), प्रत्यागत (1927 ई.), अमर-ज्योति, कीचड़ और कमल, आहत। कहानी संग्रह- दबे पाँब, मेढ़क का ब्याह, अम्बपुर के अमर वीर, ऐतिहासिक कहानियाँ, अँगूठी का दान, शरणागत, कलाकार का दण्ड, तोषी आदि। वृंदावनलाल वर्मा जी को पद्मभूषण पुरस्कार और ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

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