जनता स्टोर : नवीन चौधरी

छात्र राजनीति तथा उसमें व्याप्त चालबाज़ियाँ, शतरंज के खेल से भी कठिन चालें और राहों में बिछे मोहरे। राजनीति में कौन हमारा है कौन पराया इसका भेद कर पाना अत्यंत मुश्किल है। राजनीति कब किसकी जान ले लेगी और उसे मुद्दा बनाकर उसकी लाश पर नेता अपनी इमारत बना लेंगे यह एक परदे में रहता है। सामान्य जन के सामने आने वाला सच अनेक फ़िल्टरों से होता हुआ अनेक रैपरों में लिपटा हुआ होता है। सत्य के ऊपर इतने रंग चढ़ जाते हैं की वो सत्य नहीं रह जाता, सत्य से आगे होते हुए वह सत्य पोस्ट ट्रुथ में प्रवेश कर जाता है। राजनीति के कितने आयाम हो सकते हैं? जातिवादी समीकरण,  गुटबाज़ियाँ, हत्याएं और मीडिया इन सब से होते हुए कोई नेता हमारे सामने आता है। यह किताब छात्र राजनीति पर बात करती है पर उसी के साथ वह राज्य स्तरीय राजनीति को भी स्पर्श करते हुए चलती है। इस तरह एक पूरे राजनीतिक माहौल का निर्माण होता है।

   यह उपन्यास कुछ किरदारों की कहानी है मुख्यतः मयूर की जो राजस्थान विश्वविद्यालय का एक छात्र है और अनजाने में राजनीति में प्रवेश करता है तथा राजनीति उसमें प्रवेश कर जाती है। इस तरह उसके साथ होने वाली तमाम घटनाओं का मूल हमें बाहर तलाशने नहीं जाना पड़ता है। छात्र राजनीति बाहर से क्या दिखाई देती है? एक चमचमाती दुनिया। पर अंदर बड़ी बदसूरत स्थिति होती है। तमाम क्रांति और सुधार की बातें बस एक झूठ साबित होते हैं। हमारे राजनीतिक जीवन की विडंबना इससे बड़ी क्या हो सकती है की हमें पता होता है सामने आया व्यक्ति वोट पाने के बाद नजर नहीं आएगा फिर भी हमें उसमें उम्मीद दिखाई देती है। क्रांति और सुधार के कपड़े में लिपटे हुए लोग राजनीति में आते ही नंगे हो जाते हैं। छात्र राजनीति इन्हें एक सीढ़ी प्रदान करती है।

बाहर से हम भले ही जातिवाद को स्वयं से दूर रखना चाहें पर वह हमारे व्यवस्था से जोंक की भाँति चिपक गई है। इस उपन्यास में अनेक जगहों पर ऐसे वाक्य देखने को मिल जाते हैं जो जाति को हमारे दैनिक जीवन से लेकर राजनीति तक में दिखाते हैं-

“राजस्थान का बनिया जवानी में जो भी खाता-पीता हो, बिजनेस में लगने के बाद सात्त्विक और धार्मिक हो जाता है। उसे डर होता है कि कहीं लक्ष्मी माता उसके खाने-पीने से नाराज न हो।”

हालाँकि यह वाक्य जातिवादी स्टीरिओटाइप को दिखाता है पर प्रश्न यह है की क्या हमारा समाज आज भी इनसे दूर हो पाया है? नहीं।

“राजाओं को ख़त्म हुए ज़माने हो गए, पर राजस्थान में पूर्व महाराजाओं के शो ऑफ़ अभी भी बदस्तूर चालू हैं। शहर के आम नागरिकों में हो न हो, पर राजपूतों में अभी भी पूर्व राजघरानों के लिए सम्मान है। राजा लोग अभी भी .ओ. के बोलने की कई मौक़ों पर अपने महलों/हवेलियों पर दरबार सज़ाते हैं, जहाँ उनके ठिकानेदार राजपूती वेशभूषा में तलवारें बाँधकर इकट्ठे होते हैं और राजा साहब के सामने सिर झुकाकर उसको इक्कीसवीं सदी में भी सन् 1880 का अहसास कराते हैं। ठिकानेदार वह लोग होते हैं, जिन्हें रियासत की तरफ़ से जागीर (ठिकाना) मिली हो। इन ठिकानेदारों में बहुत सों का यूँ तो अब कोई ठिकाना न रहा, पर ऐसे दरबार लगने पर सज-धज के यह आज भी बड़ा गर्व महसूस करते हैं”

सामंतवाद और उपनिवेशवाद से हमारा देश निकाल चुका है पर यह हमारे देश से नहीं निकले हैं। यह शायद सिर्फ राजस्थान में ही नहीं है वरन लगभग पूरे भारत में है जहाँ उपाधियाँ समाप्त नहीं होती हैं। जमींदारी खत्म हो गई है पर आज भी इसका सम्बोधन नहीं गया है। यह बात सिर्फ भूतपूर्व राजाओं के परिवार और जमींदारों तक खत्म नहीं होती है। गावों में नौकरी से भी उपाधियाँ जुड़ जाती हैं। ये उपाधियाँ सिर्फ नाम तक ही सीमित नहीं रहती हैं वरन सामाजिक स्थिति का कारण बन जाती हैं।

    किसी व्यक्ति की मृत्यु उससे जुड़े लोगों के लिए गहरे दुःख का कारण हो सकती हैं, किसी की मृत्यु पर सामान्य रहना एक त्रासदी है पर राजनीति इससे भी एक कदम आगे चली जाती है। इसमें मृत्यु पर नई इमारत तैयार की जाती है, वोट बटोरे जाते हैं। ऐसी राजनीति हमारे समाज का हिस्सा है साथ ही साथ मानवता के ह्रास होने का संकेत है।

- प्रचार के बाद पढ़ना जारी रखें -

“इस तरह के आन्दोलनों में कोई मरता है तो उसका नाम राजनीतिक गिद्धों का भोजन बन जाता है”

इस तरह मृत्यु पर हो रही राजनीति को लेखक सिर्फ अनजाने व्यक्ति के लिए ही नहीं वरन किसी व्यक्ति के बहुत करीबी के मरने पर भी उस व्यक्ति द्वारा अपनी राजनीति के लिए मृत्यु का प्रयोग करना दिखाते हैं।

राजनीति का सबसे प्रमुख साथी है मीडिया। मीडिया बड़े सच को भी छुपा लेता है पर यह राजनीति के खेल में भागीदार और सत्ता के एजेंडे को दिखने के लिए होता है। इसमें तस्वीरें कैसी छपती हैं यह भी एजेंडा बनाने में मदद करता है-

“दुष्यन्त के पापा आँखों में आँसू लिये मुख्यमंत्री की तरफ हाथ जोड़े खड़े रहे। अख़बार वालों ने इमोशनल फ़ोटो का मौक़ा देख कई तस्वीरें खींच लीं”

इस प्रकार यह उपन्यास छात्र राजनीति के हर पक्ष को हमारे सामने रखता है। इसकी कहानी कहीं से भी बनावटी नहीं लगती है। यह विश्वविद्यालय के जीवन को बहुत पास से दिखाता है। यह उपन्यास नए युवा लेखकों द्वारा लिखे गए उपन्यासों में अच्छा लिखा गया है। यह उपन्यास अपनी बात कहानी पर एक मजबूत पकड़ बनाए हुए, प्रामाणिक एवं रोचक ढंग से कहता है जो इस उपन्यास की सफलता का द्योतक है।