भली लड़कियाँ बुरी लड़कियाँ : समीक्षा

“आजादी सबसे बड़ा दिलफरेब भ्रम है। और उसे भी बड़ा फरेब है प्रेम।”

अनु सिंह चौधरी का उपन्यास ‘भली लड़कियाँ बुरी लड़कियाँ’ 2019 में प्रकाशित हुआ था। इसकी कहानी मुख्यतः चार लड़कियों के आस-पास घूमती है जिसके केंद्र में पूजा नाम की लड़की है। उपन्यास किसी छोटे शहर से दिल्ली या दिल्ली विश्वविद्यालय में आकर पढ़ने वाली लड़की के साथ क्या-क्या समस्याएं होती है, पर केंद्रित है। साथ ही साथ यह एक ऐसे मोड़ तक ले जाती है जो बड़ा क्रूर और कटु यथार्थ है हमारे समाज का- बलात्कार। उपन्यास हमें अंत में सोचने के लिए छोड़ देता है।

उपन्यास की मुख्य कहानी पूजा प्रकाश के इर्द-गिर्द घूमती है। एक होनहार लड़की जिसकी दादी ने उसे यू. पी. एस. सी. का सपना दिखाया है। वह होनहार लड़की दिल्ली में आती है और दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन के बाद एक पीजी में चार लड़कियों के बीच आ जाती जी जो उससे बिल्कुल अलग हैं। यह उसके लिए एक कल्चरल शॉक था। यहाँ से दिल्ली विश्वविद्यालय के किस्से चलते है और उसका सामूहिक बलात्कार उसके पूर्व प्रेमी और उसके दोस्तों द्वारा किया जाता है और अंत में मीडिया। कहानी इन्हीं मुख्य घटनाओं से होती हुई एक भयावह चरम से आरोहित हो एक प्रश्नवाचक अंत तक आती है।

उपन्यास का शीर्षक है ‘भली लड़कियाँ बुरी लड़कियाँ’ अर्थात समाज द्वारा जो मानक बनाए गए हैं उसमें जो फिट होती हैं उन्हें भली लड़कियों की संज्ञा दी जाती है, वहीं जो फिट नहीं होती वह बुरी लड़कियाँ बन जाती हैं। उपन्यास की कहानी जिन चार पात्रों को केंद्र में लेकर चलती है वह समाज के बने हिस्से में फिट नहीं होती हैं। इस उपन्यास की प्रभावशाली पात्र सैम तनेजा कम उम्र में ही ऐसे कदम उठाती है जो समाज को बर्दाश्त नहीं है। मेघना सिम्ते उत्तर पूर्वी भारत से आई हुई है जिसको दिल्ली या उत्तर भारत में या तो चाईनीज़ कहा जाता है या नेपाली। अगर यह स्वीकार भी कर लें की वह भारत की है फिर भी तमाम संज्ञाओं से उसे बुलाते हैं और उसके प्रति एक यौन लोलुपता रखते हैं। देबजानी घोष वह लड़की है जिसे अपनी बात खुलकर रखने पर उसे चुप कराया जाता है। और एक और लड़की पूजा प्रकाश जो मुज़फ्फ़रपुर से दिल्ली इनके बीच आ गई है। उपन्यास में लेखिका लगभग हर मुख्य पात्र के बैकग्राउंड को बताती चलती हैं। अरोरा आंटी की पृष्ठभूमि बताना उनके हिस्से के संघर्ष को बताता है की यह भी एक औरत हैं।

एक लड़की जब दिल्ली विश्वविद्यालय आती है तो उसके साथ आता है बंधन पर यहाँ उसे वो मिलता है जो उसे बंधन से आज़ाद होने का टूल समझ में आता है या फिर एक रास्ता दिखाई देता है। इन्हीं रास्तों पर तमाम तरह के बंधन होते हैं जो उसे आगे बढ़ने नहीं देते और प्रेम की खाल में छुपा बलात्कारी इसमें सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में सामने आता है। यह किसी दैत्य सा किसी मोड़ पर खड़ा रहता है जो उसे डराता है। वास्तव में यह ऐसा अपराध नहीं है जो अपराधी को ज्यादा अपराधी ठहराए वरन यह लड़कियों के हिस्से में सबसे ज्यादा बुरे रूप में आता है। लड़कियों को एक तरह से समाज से बहिष्कृत कर देता है। यह एक शारीरिक हिंसा ना होकर वरन सामाजिक और मानसिक हिंसा बन जाता है ऐसे में अपराधी को कितनी कड़ी सजा दी जानी चाहिए यह तक नहीं सूझता। यहाँ तक की भारत की न्याय व्यवस्था जघन्य अपराधों की सजा देने में 7-8 साल लगा देती है। जिसके कारण मन में एक रोष व्याप्त हो जाता है।

उपन्यास में अनु सिंह जी ने जो दिल्ली विश्वविद्यालय का चित्रण किया है उसमें एक जगह त्रुटि भी नज़र आती है। उन्होंने मिरांडा हाउस से लेकर हडसन लेन तक –  पहले मिरांडा हाउस से ऑटो से विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन वहाँ से जी. टी. बी. नगर मेट्रो स्टेशन फिर वहाँ से पैदल हडसन लेन पहुंचाया है जबकी मिरांडा हाउस से सीधे हडसन लेन एक ई रिक्शे से पहुँचा जाता है। यह दृश्य दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठक को यह इशारा करता है की उपन्यास दूर रहकर लिखा गया है। इसी के साथ वह संदीप के बैकग्राउंड में जाती हैं।  वह यह बताकर की संदीप एक बड़े घर का लड़का है और उसके पिता का व्यवसाय बताकर भी आगे बढ़ सकती थीं अतः वह डीटेलिंग अधिक कारगर नजर नहीं आती है।

इस उपन्यास में जिस ढंग से बलात्कार के बाद भी लड़कियों में हिम्मत दिखाया गया है वह निसंदेह तारीफ के काबिल है और यह एक नई राह दिखाता है की ना सिर्फ उन्हें बल्कि पूरे समाज को ऐसे जघन्य अपराधों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। तभी एक परिवर्तन की आस दिखेगी। उपन्यास की भाषा वही भाषा है जो दिल्ली विश्वविद्यालय के आस-पास बोली जाती है अतः वो बनावटी नहीं लगती है। अंत में यह कहा जा सकता है की इस उपन्यास की कथा और उसका संदेश बहुत मार्मिक भी है और कष्टप्रद भी।

यह उपन्यास हिन्द युग्म और एका से प्रकाशित किया गया है।

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पेज- 176

मूल्य- 175/-