मनोहरश्याम जोशी कृत ‘कसप’ वस्तुतः एक प्रेम-कथा है। यह उपन्यास प्रथम दृष्टि में ही अपने विशिष्ट शीर्षक के कारण पाठकों को चौंकाता है। ‘कसप’ का अर्थ है – ‘क्या जाने’/ ‘पता नहीं’।
बक़ौल जोशी, “अगर आप इस शीर्षक से चौंके हों तो भी कोई हर्ज नहीं। चौंका होना प्रेम की लाक्षणिक स्थिति जो है। जिन्दगी की घास खोदने में जुटे हुए हम जब कभी चौंककर घास, घाम और खुरपा तीनों भुला देते हैं, तभी प्यार का जन्म होता है।”
उपन्यास भाषा की दृष्टि से कुछ नवीनता लिए हुए है। कुमाऊँनी के शब्दों से सजी ‘कसप’ की हिन्दी चमत्कृत करती है। इसी कुमाऊँनी मिश्रित हिन्दी में मनोहरश्याम जोशी ने कुमाऊँनी जीवन का चित्ताकर्षक चित्र उकेरा है – ‘कसप’ में।
कुछ संवादों में जो कुमाऊँनी हिंदी प्रयुक्त हुई है वह पाठक को थोड़े अभ्यास से स्वयं समझ आ जाने वाली है। ‘कहा’, ‘बल’, ‘ठहरा’, ‘वाला ठहरा’, ‘जो’ आदि शब्दों का प्रयोग विशिष्ट अर्थ में किया गया है।
समीक्षकों ने ‘कसप’ को प्रेमाख्यानों में अज्ञेय के उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि कहा है। ‘कसप’ मूलतः एक ऐसा उपन्यास है जिसमें मध्यवर्गीय मानसिकता, कुलांचे भरती है। इसका दार्शनिक ढाँचा भी मध्यमवर्गीय यथार्थ पर टिका है। यही वह बिन्दु है जहाँ ‘कसप’ अपने तेवर में ‘नदी के द्वीप’ से अलग ठहरता है। ‘नदी के द्वीप’ का तेवर बौद्धिक और उच्चवर्गीय है, जबकि ‘कसप’ एक ऐसा प्रेमाख्यान है जिसमें ‘दलिद्दर’ से लेकर ‘दिव्य’ तक का स्वर ‘मध्य’ पर ही ठहरता है और इस उपन्यास को सरसता, भावुकता और ग़ज़ब की पठनीयता से लवरेज करता है।
उपन्यास पढ़ कर हम यह समझ पाते हैं कि प्रेम किन्हीं सयानों द्वारा बहुत समझदारी से ठहरायी जानेवाली चीज नहीं है, वह तो विवाह है जो इस तरह ठहराया जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान प्रेम के विषय में, मौन ही रहा है किन्तु कभी जब उसने प्रेम पर विचार किया तो वह भी इस लोक-विश्वास से सहमत होता प्रतीत हुआ है कि ‘असम्भव’ के आयाम में ही होता है प्रेम-रूपी व्यायाम। जो एक-दूसरे से प्यार करते हैं वे लौकिक अर्थ में एक-दूजे के लिए बने हुए होते नहीं।
नायक-नायिका की प्रथम मुलाकात के बाद ही नायक बिना एक पल सोचे यह प्रार्थना करता है कि “जब तक साँस चल रही है तब तक यही लड़की प्रतिपल मेरी आँखों के सामने रहे।”प्रेम होता ही अतिवादी है। यह बात प्रौढ़ होकर ही समझ में आती है उसके कि विधाता अमूमन इतना अतिवाद पसन्द करता नहीं। खैर, सयाना-समझदार होकर प्यार, प्यार कहाँ रह पाता है!
इस उपन्यास में मध्यवर्गीय जीवन की टीस को अपने पंडिताऊ परिहास में ढालकर एक प्राध्यापक ने मानवीय प्रेम को स्वप्न और स्मृत्याभास के बीचोबीच ‘फ्रीज’ कर दिया है। 1910 के काशी से लेकर 1980 के हॉलीवुड तक की अनुगूँजों से भरा, गँवई, अनाथ, भावुक साहित्य-सिनेमा अनुरागी लड़के और काशी के समृद्ध शास्त्रियों की सिरचढ़ी, खिलन्दड़, दबंग लड़की (जो बहुत तेजी से एक परिष्कृत युवती मैत्रेयी में बदल जाती है) के संक्षिप्त प्रेम की विस्तृत कहानी सुनानेवाला यह उपन्यास एक विचित्र-सा उदास-उदास, मीठा-मीठा-सा प्रभाव मन पर छोड़ता है। ऐसा प्रभाव जो ठीक कैसा है, यह पूछे जाने पर एक ही उत्तर सूझता है – ‘कसप!… (पता नहीं)
अक्सर लेखक कुछ रचता है तो उसके दिलो-दिमाग में पहले ही रचना का कथानक तैयार होता है मगर इस उपन्यास की शुरुआत से पहले जोशी ‘कंसंगश्यांग सबस्याओ’ नामक एक विज्ञान कथा लिख रहे थे मगर उनकी पत्नी की इच्छा के कारण उन्हें विज्ञान कथा बीच में ही छोड़कर यह प्रेमकथा लिखनी पड़ी (इसका ज़िक्र उन्होंने ‘कसप’ के समर्पण में किया है)
उस समय जोशी जल्द से जल्द छोटी सी प्रेमकथा लिख कर अपनी उस विज्ञान कथा को दुबारा शुरू करना चाहते थे इसके बावजूद अपने कथानक के कारण यह उपन्यास हिंदी साहित्य में रूची रखने वालों के हृदय में अपना स्थान बनाए हुए है।
