आँसू का वज़न केदारनाथ सिंह जी के मरणोपरांत उनका दूसरा काव्य संग्रह है जिसे वाणी प्रकाशन ने इसी साल प्रकाशित किया है, आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है।
केदारनाथ सिंह की रचनाओं में भाषा का बिल्कुल अलग रूप देखने को मिलता है। वे अपनी कविताओं में नये-नये किरदार गढ़ते हैं, उनकी कविताओं में गाँव और शहर दोनों ही परिवेश के लोगों को दर्शाया जाता है, और ऐसा ही इस किताब में भी है। गाँव की जीवनशैली से जुड़ी कितनी ही कवितायें उनके ग्रामीण जीवनशैली से प्रेम को दर्शाता है।
कविताओं में शहर और बड़े नगरों में जूझते हुए लोगों को भी दिखाया गया है। उनकी रोज़मर्रा की जीवनशैली और उसकी कठिनाइयों को केदारनाथ जी ने परत-दर-परत खोला है। “नये शहर में बरगद” कविता एक नए शहर में बसने वाले व्यक्ति की असहायता दिखाती है।
“बनता हुआ घर” एक ऐसी कविता है जो किसी के जीवन में भौतिकता का प्रभाव दिखाती है जो किसी के लिये आरामदेह तो है परंतु उसके सामने कोई भी बौना महसूस करने लगता है।
इसके अलावा उनकी कविताओं में बैल, हल, महुआ, आम, बाँस, भाषा, संगीत, प्याज, हल्दी, कीचड़, दोपहर, पृथ्वी, फूल, सीढ़ीयाँ, घर, विज्ञान आदि को इतने करीने से लगाया गया है कि ये सब एक-दूसरे की पूरक मालूम होने लगती हैं। मानों किसी एक भी चीज़ की कमी भी इस किताब को इसके मूल रूप से अलग कर देगी।
भाषा में एक ठहराव और अक्खड़पन है जो पढ़ते हुए निरंतर महसूस होता रहता है। भाषा का प्रवाह हर कविता में एक जैसा है इसलिये भाषाई एकरसता कहीं भी टूटती हुई दिखाई नहीं देती है।
“विज्ञान और नींद” कविता में मनुष्यों के जीवन पर विज्ञान का हस्तक्षेप दर्शाया गया है, निम्न पंक्तियाँ इस बात पर ख़रा उतरती हैं-
“पर जब बिस्तर पर जाता हूँ
और रोशनी में नहीं आती नींद
तो बत्ती बुझाता हूँ
और सो जाता हूँविज्ञान के अंधेरे में
अच्छी नींद आती है।”
उपरोक्त पंक्तियाँ इस बात का साफ उदाहरण हैं कि केदारनाथ सिंह ने जिस प्रकार की कवितायें लिखी हैं उसमें उन्होंने मानवीय जीवन को सर्वोपरि माना है। उनके अनुसार एक मानव का सुख ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। इसलिये उन्होंने मानव जीवन को इतने बेहतर ढंग से इस संग्रह में प्रस्तुत किया है।
पूरी किताब आपको बाँधे रखेगी, कहीं ना कहीं आप ख़ुद को इन कविताओं में ढूँढने की कोशिश करने लगेंगे। केदारनाथ सिंह की कुछ पुरानी रचनायें भी आपको इस किताब में पढ़ने को मिलेंगी। यकीनन यह वह किताब है जिसे पढ़ा जाना चाहिये।
अंकुश कुमार
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