सुजाता जी का उपन्यास ‘एक बटा दो’ समाज के किसी मध्यमवर्गीय परिवार में दो स्त्रियों की कहानी है। ‘निवेदिता’ और ‘मीना’ दोनों परिवार के तमाम जालों में फंसी हुई रहती हैं। वे स्वतंत्र होना चाहती हैं। यह उपन्यास स्त्री के मन की गहरी पड़ताल हमारे समक्ष रखता है। हमें वो सच दिखाता है जो सामान्यतः हमारे सामने नहीं होता है। पितृसत्ता की गहरी जड़ों को बेपर्दा करता यह उपन्यास हमें सोचने को मजबूर करता है। विवाह और प्रेम के बीच भी एक स्त्री किस तरह इसी व्यवस्था के जंजाल में उलझ जाती है, किस तरह प्रेम से हुआ विवाह भी उसके जीवन में दहलीज़ बन जाता है, किस तरह वह अपने बच्चों की तरफ देखती है और पारिवारिक संरचना में पिसती रहती है। इन सभी बातों को बड़े ही मनोविश्लेषणात्मक ढंग से इस उपन्यास में पेश किया गया है।
सिमोन द ब्यूवा कहती हैं – ‘स्त्री पैदा नहीं होती उसे बनाया जाता है’
“पुनर्वास कॉलनी का यह सरकारी स्कूल एक अजीब सा सुधारगृह था। पन्द्रह बाई पन्द्रह के पत्थर की छत वाले कमरे में सत्तर लड़कियाँ। इनमें से आधी को देखकर यक़ीन किया जा सकता था कि अजगर भी कुछ होता है। एक चलती-फिरती, पथराई आँख वाली मृत मानव देह!”
सुजाता हमें स्त्री निर्माण की तरफ भी ले जाती हैं। उपन्यास का एक अंश इस निर्माण प्रक्रिया का अंश हमारे सामने प्रस्तुत करता है। पुरुष के कुछ करने की भी जिम्मेदारी स्त्री पर थोपा जाता रहा है। ये घटनाएं समाज में साफ दिखाई देती हैं की जब कोई लड़का किसी लड़की को प्रेमपत्र देता है और यह बात बाहर आती है तो हमेशा से ही लड़की को चरित्रहीन घोषित किया जाता है। इतना ही नहीं उसे बराबर इस बात को अपराध की तरह याद दिलाया जाता है। एक लड़की की उम्र पर बचपन से ही पूरे समाज की नज़र होती है। यह भी उसे हर पल ध्यान दिलाया जाता है। परिवार उसके अंकपत्र में उसका सुनहरा भविष्य देखने की बजाय यह देखता है कि अब उसकी शादी की उम्र हो गई है। उसकी चौहद्दियाँ निर्धारित की जाती हैं। इस तरह अनेक क्रियाकलापों से स्त्री का निर्माण होता है। उपन्यास का एक हिस्सा देखें-
“वे हर सवाल पर भयभीत हो सकती थीं। बाबा भारती के घोड़े का क्या नाम था यह न पूछकर मैं यह पूछती कि इस पीरियड में पढ़ाई की जगह कुछ भी और करने की आज़ादी हो तो क्या करोगी? तो भी वे भयभीत हो जातीं यह सोचकर कि मैं उनके अनुशासन की परीक्षा लेना चाहती हूँ। वे डरी हुई लड़कियाँ थीं जो इतनी मज़बूत हो चुकी थीं कि कितनी भी मार सह सकती थीं।”
इस उपन्यास में स्त्री के आर्थिक स्वतंत्रता के बाद भी एक बड़े ही जटिल बंधन को दिखाया गया है। यह बंधन सामाजिक, पारिवारिक और दैहिक भी है। वह अपने देह को देखती है जो संतान को पैदा करते हुए या गर्भपात कराते हुए विकृत होती जाती है। ये एक बड़ी त्रासदिक बात है कि किसी का उसके देह तक पर भी अधिकार नहीं है। ऐसे में एक पीड़ा, एक चिड़चिड़ाहट और एक असंतोष से भर जाना स्वाभाविक लगता है। सुजाता इन सभी को बड़े ही मनोवैज्ञानिक तरीके से सपनों और दृश्यों के माध्यम से दिखाती हैं। ये दृश्य सपनों की तरह बेतरतीब दृश्य हमें उस उलझन और मानसिक द्वन्द्व की तरफ ले जाते हैं। नौकरी के बारे में उनका दुश्मन तो समाज जैसे आदिकाल से रहा है। नौकरी, परिवार और बच्चों में झूलती स्त्रियाँ निश्चित ही ‘निवेदिता’ और ‘मीना’ की तरह होती होंगी। नौकरी को लेकर जो एक अजीब तरह की गांठ होती है वह इस संवाद मात्र से खुलने लगती है जब स्कूल की एक अध्यापिका रिटायर हो रही हैं और उनकी बेटी का खत आया है जिसमें लिखा है-
“माँ जब हम छोटे से थे और आपको नौकरी पर जाना होता था तो हम बहुत उदास होते थे। मैं अक्सर सोचती थी कि माँ को हमारे साथ रहना चाहिए। मुझे बुरा लगता था। आज जब मैं ख़ुद नौकरी में हूँ और मेरी एक बच्ची है मुझे आपके नौकरी करने की अहमियत समझ आती है।”
इस तरह संतान और नौकरी के बीच पेंडुलम की तरह झूलती स्त्री का दर्द अक्सर पुरुषों की अनुभूति से पार होता है, वैसे ही जैसे मातृत्व की अनुभूति।
इन सब के बीच एक बड़ी ही प्रमुख बात अभिभावक बनने की और उसके जिम्मेदारी की भी है। क्यों वह स्त्री के हिस्से पड़ती है? एक संतान को पैदा करने की जो पीड़ा है और उसके बाद उसकी जिम्मेदारी का संघर्ष भी इस उपन्यास में प्रमुख रूप से दिखाई देता है। एक दृश्य देखिए जब निवेदिता सोच रही है-
“अभी डेट आने में तीन दिन बाक़ी हैं लेकिन सारे लक्षण प्रकट हो चुके हैं। फिर से वही सब होगा। पर्दे के रंग से, रसोई के किसी मसाले या तेल से, सुबह उठकर दाँत मांजते हुए, घर में घुसते हुए घर की घर वाली गंध से…किसी भी बात से कै हो सकती थी…चाय पीना छूट जाएगी फिर से…खाना खाते ही फिर से भूखी हो जाऊँगी जन्म जन्म की, मुँह में थूक के बड़े घूँट जाएँगे और लगेगा जैसे समुद्र के बीचोबीच किसी क्रूज़ में हूँ…पानी के गिलास में अचानक मछली की गंध मिल जाएगी। सबको अण्डे उबालने से कैसे रोकूँगी…उसकी बदबू बरदाश्त नहीं होगी मुझसे। रात तक पाँव सूजकर दुगने मोटे हो जाएँगे। सुबह उठने का मन नहीं करेगा और रोते हुए रसोई की शक्ल देखूँगी।”
यह उपन्यास बड़े ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि इसके बारीक संवादों में और दृश्यों में बड़ी बातें छुपी हैं, बल्कि वह स्पष्ट है बस नज़रों पर से चश्मे को हटाने की जरूरत है। एक दृश्य में एक पात्र मीना से ब्यूटी के बारे में पूछता है क्योंकि वह पार्लर में काम करती थी तो उसका जवाब रहता है-
“हम बाज़ार में बैठे हैं। जैसे बाज़ार समझा देता है उसे ही सब ब्यूटी मानने लगते हैं।”
इसी तरह इस उपन्यास में अन्य पात्रों के जो छोटे-छोटे हिस्से हैं वह भी समाज की पड़ताल करते हैं। इस तरह यह उपन्यास समाज के कई मुद्दे हमारे सामने प्रस्तुत करता है। आखिर में हमें वहाँ छोड़ देता है जहाँ तमाम संत्रासों को झेलती स्त्री ने एक विराम ले लिया है और जैस वह पहली बार या बहुत दिनों बाद स्वतंत्रता को महसूस करती है। यह दृश्य पाठक की यात्रा को वहाँ पहुँचाकर उसे सोचने के लिए छोड़ देता है।
-उज्ज्वल
